
वॉशिंगटन। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित बहुप्रतीक्षित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को भारतीय-अमेरिकी कारोबारी नेताओं से मजबूत समर्थन मिला है, जबकि नीति क्षेत्र के दिग्गजों की प्रतिक्रियाएं मिश्रित लेकिन काफी हद तक रचनात्मक रहीं। समर्थकों ने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया, वहीं पूर्व अधिकारियों ने समझौते के ब्योरे स्पष्ट न होने तक सतर्कता बरतने की सलाह दी।
वेंचर कैपिटलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी की फंडरेज़र आशा जडेजा मोटवानी ने कहा कि यह समझौता ट्रंप प्रशासन के हलकों में पहले से अपेक्षित था और उन्होंने इसके नतीजे को बड़ी सफलता करार दिया। आईएएनएस से बातचीत में उन्होंने कहा, “इस व्यापार समझौते की उम्मीद थी… यह साफ संकेत था कि फरवरी में कोई समझौता होने जा रहा है।” उन्होंने कहा कि यह और भी जल्दी सामने आ गया, जो उनके लिए आश्चर्य की बात थी।
मोटवानी ने भरोसा जताया कि प्रधानमंत्री मोदी भारत की ऊर्जा आपूर्ति रणनीति में बदलाव के लिए तैयार होंगे। उन्होंने कहा, “मुझे पहले से पता था कि प्रधानमंत्री मोदी ऐसे व्यापार समझौते के लिए तैयार होंगे, जिससे रूस के तेल की जगह अमेरिका या अमेरिका के सहयोगी देशों का तेल लिया जा सके।” उन्होंने टैरिफ से जुड़े नतीजों को “जितना अच्छा हो सकता है, उतना ही बेहतरीन” बताया।
उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन अब भारत को “केंद्रीय भूमिका वाला देश” मानता है, खासकर ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग के संदर्भ में, और यह रिश्ता पूरी तरह पटरी पर लौट आया है। “यह पूरी तरह से मजबूत और स्थिर है,” उन्होंने कहा और दोनों देशों के निजी क्षेत्र से तेजी से साझेदारी और व्यावसायिक सौदे आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
वहीं, अमेरिका के पूर्व सहायक वाणिज्य सचिव (ट्रेड डेवलपमेंट) रेमंड विकरी ने अधिक सतर्क रुख अपनाते हुए कहा कि यह समझौता मुख्य रूप से द्विपक्षीय संबंधों में आई गिरावट को रोकने का काम करता है। उन्होंने कहा, “इस समझौते का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह भारत-अमेरिका संबंधों में आई गिरावट को थामता है,” और हालिया तनाव के लिए टैरिफ, वीजा मुद्दों और अन्य विवादों को जिम्मेदार ठहराया।
विकरी ने टैरिफ में “25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत” किए जाने का स्वागत किया, लेकिन यह भी कहा कि इसके दायरे से जुड़े अहम विवरण अभी स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि भारत द्वारा टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं खत्म किए जाने के दावे, खासकर कृषि, डेयरी, दालें और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में, कितने सही हैं।
उन्होंने प्रशासन द्वारा बताए गए आंकड़ों पर भी सवाल उठाए और कहा कि 500 अरब डॉलर की अतिरिक्त खरीद का दावा “असाधारण” है, जबकि मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार लगभग 200 अरब डॉलर का है।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) में इंडिया और इमर्जिंग एशिया इकोनॉमिक्स के चेयर रिक रॉसो ने कहा कि यह समझौता ऐसे समय आया है, जब भारी टैरिफ के बावजूद व्यापार उम्मीद से ज्यादा मजबूत रहा। उन्होंने कहा, “2025 के अधिकतर समय में ऊंचे टैरिफ लागू रहने के बावजूद भारत-अमेरिका व्यापार आश्चर्यजनक रूप से मजबूत रहा,” और बताया कि फार्मास्यूटिकल्स जैसे कुछ क्षेत्रों को मिली छूट के कारण पिछले साल करीब 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।
हालांकि, रॉसो ने साल के अंतिम महीनों में व्यापार में थोड़ी सुस्ती की बात कही और चेतावनी दी कि अगर अमेरिका पीछे रहा तो भारत अन्य देशों के साथ समझौते कर आगे बढ़ सकता है। उन्होंने मौजूदा घोषणा को संभावित “पहला चरण” बताया, जिससे भारत में बाजार पहुंच बेहतर होगी और अमेरिकी आयात पर टैरिफ “सामान्य स्तर” पर लौट सकेंगे।
ओहायो से रिपब्लिकन नेता नीरज अंतानी ने इस समझौते को निर्णायक कदम बताते हुए स्वागत किया। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक बेहतरीन दिन है, क्योंकि हमने एक व्यापार समझौता किया है।” उन्होंने टैरिफ में पारस्परिक कटौती और भारत द्वारा रूसी तेल खरीद रोकने के फैसले को अहम बताया।
अंतानी ने कहा कि “25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत” किया जाना भारत के हित में है और यह समझौता दोनों देशों के लिए लाभकारी है। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि हमारी दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं मिलकर काम करें,” और जोड़ा कि यह समझौता उस लंबे गतिरोध को खत्म करता है, जिसे पिछली सरकारें सुलझा नहीं पाईं।
भारतीय-अमेरिकी उद्यमी योगी चुघ ने कहा कि यह समझौता प्रवासी कारोबारी समुदाय के लिए एक निर्णायक मोड़ है। उन्होंने कहा, “हम में से कई भारतीय-अमेरिकी व्यवसायियों के लिए आज का समझौता एक वास्तविक सफलता है,” और इसे “वैश्विक प्रतिस्पर्धा के तेज होते दौर में भरोसा बढ़ाने वाला रणनीतिक कदम” बताया।
भारत और अमेरिका पिछले कई वर्षों से एक व्यापक व्यापार ढांचे पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन टैरिफ विवादों, बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दों और राजनीतिक तनाव के कारण बातचीत बार-बार अटकती रही। इन चुनौतियों के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार बढ़ता रहा और यह 200 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
यह घोषणा ऐसे समय आई है, जब दोनों देश ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकियों जैसे व्यापक रणनीतिक लक्ष्यों के साथ आर्थिक सहयोग को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। समझौते का पूरा पाठ जारी होने के बाद और अधिक स्पष्टता आने की उम्मीद है।
With inputs from IANS