अफगान युद्ध तेज होने पर ISI ने वफादारी बदलने वाले अपने ही ‘एसेट्स’ को निशाना बनायाBy Admin Sat, 28 February 2026 11:38 AM

नई दिल्ली: अफगानिस्तान के साथ बढ़ते संघर्ष के बीच Inter-Services Intelligence (ISI) को यह अहसास होने लगा है कि उसके कई पुराने एसेट्स उसका साथ छोड़कर विरोधी खेमे में चले गए हैं। इसी कारण पाकिस्तान कथित तौर पर उन एसेट्स को खत्म करने की रणनीति अपना रहा है, जो अफगान युद्ध के दौरान अपनी वफादारी बदल रहे हैं।

2021 में जब Taliban ने अफगानिस्तान की सत्ता दोबारा संभाली, तब पाकिस्तान ने जिस तरह के हालात की कल्पना की थी, वास्तविकता उससे बिल्कुल अलग निकली। अफगानिस्तान ने अधिक व्यावहारिक रुख अपनाते हुए India के साथ नजदीकियां बढ़ाईं, जिसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता की दिशा में पहला कदम माना जा रहा है। इस नीति बदलाव से पाकिस्तान को बड़ा झटका लगा है।

खुफिया एजेंसियों के अनुसार, इस बदलाव के बाद पाकिस्तान के कई जाने-पहचाने एसेट्स ने पाला बदल लिया। इनमें हाजी लाली मामा नूरजई का मामला सबसे अहम माना जा रहा है, जो वर्षों तक ISI का शीर्ष एसेट रहा। नूरजई भारत के खिलाफ आतंकी हमलों की साजिश रचने में ISI का प्रमुख चेहरा था और पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर आत्मघाती हमलावरों के प्रशिक्षण शिविर चलाता था।

नूरजई के तालिबान से भी अच्छे संबंध थे। उसकी रहस्यमयी मौत को पाकिस्तान ने दिल का दौरा बताया, लेकिन खुफिया सूत्रों का कहना है कि तालिबान के करीब जाने के संदेह में ISI ने ही उसे खत्म कर दिया।

एक इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारी के अनुसार, 2021 के बाद से ISI ने अपने कई पूर्व एसेट्स को खत्म करने के लिए गुप्त अभियान चलाए हैं। अनुमान है कि तालिबान के प्रति वफादारी दिखाने वाले कम से कम 40 ऐसे लोगों को ISI ने समाप्त कर दिया।

इन एसेट्स का मानना है कि पाकिस्तान की तुलना में अफगानिस्तान में रहना अधिक सुरक्षित है। पाकिस्तान सेना को पिछले कई महीनों से Tehrik-i-Taliban Pakistan (TTP) से भारी नुकसान उठाना पड़ा है, जिसने ISI से जुड़े लोगों की सूची बनाकर उन्हें निशाना बनाना शुरू कर दिया है।

इसके अलावा, Operation Sindoor के बाद हालात और बदले। इस अभियान में भारत ने पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क को गंभीर नुकसान पहुंचाया, जिससे आतंकियों और ISI एसेट्स के बीच पाकिस्तान सेना की सुरक्षा क्षमता को लेकर भरोसा कमजोर हुआ। इसका असर Lashkar-e-Tayiba और Jaish-e-Mohammad जैसे संगठनों पर भी पड़ा।

अधिकारियों का कहना है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थक रहे कई लोग अब अपना रुख बदल रहे हैं। तालिबान का भारत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण इसका बड़ा कारण है। भारत लगातार कूटनीति, विकास और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर देता रहा है, जिसे तालिबान भी समझ रहा है।

पूर्व ISI समर्थकों का मानना है कि मौजूदा हालात में पाकिस्तान का मोहरा बने रहना व्यर्थ है। इससे ISI की पकड़ कमजोर हुई है और उसकी पुरानी नीति—नियंत्रण और दबाव—अब कारगर नहीं रही।

हालांकि ISI छाया युद्ध (शैडो ऑपरेशंस) जारी रख सकती है, लेकिन बड़ी संख्या में एसेट्स के पलायन से उसका प्रभाव तेजी से घट रहा है। एक अधिकारी के अनुसार, “पाकिस्तान के पास हथियारों की ताकत भले हो, लेकिन वह अपने ही एसेट्स को विरोधी खेमे में जाने से रोकने के लिए अब पर्याप्त नहीं है।”

 

With inputs from IANS