

नई दिल्ली। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जारी विरोध प्रदर्शनों ने पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान की चिंता बढ़ा दी है। व्यापक कार्रवाई, बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों पर सख्ती के बावजूद आंदोलन थमता नजर नहीं आ रहा है। अब शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर आंदोलन की धार कमजोर करने की रणनीति अपनाई जा रही है।
इसी क्रम में संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के प्रमुख नेता और पीओके के चर्चित सामाजिक-राजनीतिक चेहरे शौकत नवाज मीर को एक संयुक्त अभियान के दौरान गिरफ्तार किया गया। खुफिया एजेंसियों, स्थानीय पुलिस और पाकिस्तान रेंजर्स ने उन्हें हिरासत में लेने के बाद रावलपिंडी भेज दिया।
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की रणनीति में बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग, कथित जबरन गुमशुदगी, महिलाओं और बच्चों पर गोलीबारी तथा धमकियों का सहारा लिया गया, लेकिन इन कदमों से आंदोलन कमजोर होने के बजाय और तेज हुआ।

अधिकारियों का मानना है कि अब शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के जरिए आम लोगों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की जा रही है, ताकि समय के साथ आंदोलन स्वतः कमजोर पड़ जाए।
सूत्रों का यह भी कहना है कि शौकत नवाज मीर को रावलपिंडी ले जाकर सेना की प्रत्यक्ष निगरानी में रखना भी एक संदेश देने की कोशिश है कि यदि प्रदर्शन जारी रहे तो अन्य नेताओं के साथ भी ऐसा ही किया जा सकता है।
हालांकि, जेएएसी ने साफ कहा है कि आंदोलन किसी एक नेता पर निर्भर नहीं है। संगठन का कहना है कि यह जनता का आंदोलन है और नेतृत्व की अनुपस्थिति में भी विरोध जारी रहेगा।
सूत्रों के मुताबिक, शौकत नवाज मीर के अलावा कई अन्य नेताओं पर भी आतंकवाद निरोधक कानूनों के तहत मामले दर्ज किए जा रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह आम नागरिकों के विरोध का नहीं, बल्कि कथित आतंकवाद का सामना कर रहा है।
पीओके के प्रदर्शनकारी लंबे समय से गेहूं पर सब्सिडी, बिजली की उचित दरें और स्थानीय संसाधनों के कथित दोहन को रोकने जैसी मांगें उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि इन मुद्दों पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान को उम्मीद थी कि पहले की तरह यह आंदोलन भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा, लेकिन इस बार हालात अलग हैं और पीओके में पहले कभी न देखे गए संकट की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।
अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि क्षेत्र के कुछ प्रदर्शनकारी अब स्वयं को पाकिस्तान का हिस्सा मानने से इनकार करते हुए स्वतंत्रता की मांग उठा रहे हैं।
इस बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस बयान ने भी विवाद खड़ा कर दिया, जिसमें उन्होंने रावलकोट और मीरपुर के लोगों को "वास्तविक कश्मीरी" नहीं बताया था। सूत्रों का कहना है कि इस टिप्पणी से स्थानीय लोगों में नाराजगी और बढ़ी है तथा मतभेद और गहरे हुए हैं।
सूत्रों का यह भी दावा है कि केवल पीओके ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के भीतर भी आर्थिक संकट और अन्य समस्याओं को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान की नीतियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
इन परिस्थितियों में, अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान भटकाने के लिए भारत को मुद्दे के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान ने आरोप लगाया है कि पीओके के विरोध प्रदर्शनों के पीछे भारत का हाथ है, हालांकि इस दावे को व्यापक समर्थन नहीं मिला है।
हाल के दिनों में पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है। उसका प्रयास यह दिखाने का है कि भारत द्वारा पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को स्थगित करने के फैसले के कारण वह जल संकट का सामना कर रहा है और भारत तथाकथित "जल आतंकवाद" अपना रहा है।
सूत्रों का कहना है कि इस रणनीति का उद्देश्य पीओके में चल रहे विरोध और देश के आर्थिक संकट जैसे आंतरिक मुद्दों से ध्यान हटाना है। अधिकारियों का यह भी दावा है कि पाकिस्तान जल प्रबंधन की कमियों, जर्जर नहर प्रणाली और बांधों के खराब रखरखाव जैसे घरेलू कारणों पर चर्चा से बच रहा है।
सूत्रों के अनुसार, वित्तीय संकट के कारण डायमर-भाषा और दासू जैसे प्रमुख बांध परियोजनाएं भी प्रभावित हुई हैं, लेकिन इन चुनौतियों का उल्लेख आम जनता के सामने नहीं किया जा रहा है।
With inputs from IANS