रिपोर्ट: प्रधानमंत्री मोदी के तीन देशों के दौरे से हिंद-प्रशांत में भारत की रणनीतिक पकड़ मजबूत, चीन की बढ़ती सक्रियता पर भी नजरBy Admin Sat, 11 July 2026 09:29 PM

बीजिंग: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की हालिया तीन देशों की यात्रा को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है। एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, यह दौरा ऐसे समय हुआ जब चीन क्षेत्र में अपनी सैन्य और रणनीतिक गतिविधियां तेज कर रहा है।

ऑनलाइन पत्रिका 'द डिप्लोमैट' में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 6 जुलाई को चीन ने परमाणु ऊर्जा से संचालित पनडुब्बी से डमी वारहेड के साथ लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। यह परीक्षण उसी दिन हुआ, जब प्रधानमंत्री मोदी अपने तीन देशों के दौरे के पहले चरण में इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पहुंचे थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दोनों ने चीन के इस मिसाइल परीक्षण पर चिंता जताई और इसकी आलोचना की। विश्लेषण के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने का अवसर दिया। साथ ही, इससे 'स्वतंत्र और मुक्त हिंद-प्रशांत' (फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक) की उस अवधारणा को भी बल मिला, जिसे क्वाड देशों ने क्षेत्रीय सहयोग का आधार बनाया है।

भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा तैयार किया जा रहा "विश्वास का नया दायरा" मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के बीच हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में यह दूसरा अवसर था जब चीन ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। इससे पहले सितंबर 2024 में भी ऐसा परीक्षण किया गया था। हालांकि चीन ने कुछ देशों को पहले से इसकी सूचना दी थी, लेकिन यह कदम उसकी बढ़ती सैन्य क्षमता, परमाणु प्रतिरोधक रणनीति और क्षेत्र में अधिक सक्रिय सैन्य उपस्थिति की मंशा को दर्शाता है।

विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि अमेरिका ने इस परीक्षण को "गंभीर चिंता" का विषय बताते हुए अपने सहयोगी देशों के प्रति सुरक्षा प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी सक्रियता पहले की तुलना में कम होती दिखाई दे रही है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वाशिंगटन अब क्वाड को लेकर पहले जितना उत्साहित नहीं दिखता और उसकी रणनीति में 'हिंद-प्रशांत' शब्दावली को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन के साथ वैश्विक मामलों के प्रबंधन के लिए द्विपक्षीय व्यवस्था (जी-2) की सोच को भी चीन की आक्रामक विदेश नीति का प्रभावी जवाब नहीं माना गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन परिस्थितियों के बावजूद भारत ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंडोनेशिया के साथ उसकी बढ़ती रणनीतिक साझेदारी को अमेरिका से दूरी बनाने के रूप में न देखा जाए।

इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि पिछले महीने फ्रांस के एवियां-ले-बैंस में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की द्विपक्षीय बैठक में ट्रंप द्वारा दिए गए अनौपचारिक सुरक्षा आश्वासनों का नई दिल्ली में सकारात्मक स्वागत किया गया।

हालांकि, रिपोर्ट ने यह भी कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दीर्घकालिक और बहुआयामी रणनीति को प्रभावी बनाए रखने के लिए भारत को पर्याप्त संसाधनों और लगातार राजनीतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होगी, जो उसकी क्षमताओं पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

इसके बावजूद रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि किसी बड़े संकट का इंतजार करने के बजाय प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के माध्यम से ऐसे रणनीतिक सहयोगों को अभी से मजबूत करना भारत की सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकता है। इससे भारत विभिन्न देशों के साथ समानांतर साझेदारियों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाते हुए क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति और अधिक मजबूत कर सकता है।

 

With inputs from IANS