चीन ईरान से बना रहा है रणनीतिक दूरी, आर्थिक रिश्ते हालांकि मजबूत: रिपोर्टBy IANS Fri, 18 September 2026 03:39 PM

चीन और ईरान के बीच आर्थिक संबंध महत्वपूर्ण बने हुए हैं, लेकिन बीजिंग तेहरान के साथ अपने व्यापक मध्य पूर्व रणनीतिक हितों को जोड़ने से फिलहाल सावधानी बरत रहा है। MBN की एक रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, हाल में नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच सार्वजनिक रूप से कोई प्रमुख बातचीत या मुलाकात देखने को नहीं मिली। रिपोर्ट के लेखक जिम स्नाइडर ने इसे दोनों देशों के बीच दिखाई देने वाली दूरी का संकेत बताया है।

हालांकि, इस एक घटनाक्रम से चीन-ईरान संबंधों की पूरी तस्वीर निकालना उचित नहीं होगा। चीन अभी भी ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। अमेरिकी-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के अनुसार, 2025 में चीन ने ईरान से करीब 1.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा, जो उसके कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 12 प्रतिशत था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की नीति को समझने के लिए उसके पूरे पश्चिम एशियाई आर्थिक हितों को देखना जरूरी है। बीजिंग के अरब देशों के साथ भी बड़े व्यापारिक संबंध हैं। अमेरिकी-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के मुताबिक, 2025 में चीन का सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, दोनों के साथ द्विपक्षीय व्यापार करीब 108-108 अरब डॉलर था, जबकि ईरान के साथ यह आंकड़ा तेल आयात को शामिल करने पर करीब 41.2 अरब डॉलर रहा।

विशेषज्ञों के अनुसार, चीन ईरान के साथ सहयोग करते हुए भी पश्चिम एशिया के अन्य महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ अपने संबंधों को जोखिम में नहीं डालना चाहता। हालिया विश्लेषण भी संकेत देते हैं कि बीजिंग ने ईरान को समर्थन देने के बावजूद अपनी भूमिका को इस तरह संतुलित किया है कि उसके व्यापक क्षेत्रीय और आर्थिक हित प्रभावित न हों।

चीन और ईरान के बीच आर्थिक रिश्तों की बुनियाद ऊर्जा और व्यापार पर टिकी है। चीन को ईरान से अपेक्षाकृत सस्ता तेल मिलता है, जबकि ईरान को चीन के बाजार और चीनी वस्तुओं तक महत्वपूर्ण पहुंच मिलती है। मौजूदा परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच तेल के बदले चीनी सामान की व्यवस्था भी सामने आई है, जिसके जरिए ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच अपना व्यापार जारी रखने की कोशिश कर रहा है।

दोनों देशों ने मार्च 2021 में 25 वर्षीय व्यापक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें ऊर्जा, बुनियादी ढांचे, व्यापार और सुरक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग की रूपरेखा शामिल है। हालांकि, समझौते की घोषणा के बाद अपेक्षित स्तर पर चीनी निवेश नहीं आया। अमेरिकी-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के अनुसार, प्रतिबंधों के कारण चीनी कंपनियों में ईरान में बड़े निवेश को लेकर झिझक बनी रही।

चीन की ईरान नीति में यह संतुलन हाल के घटनाक्रमों में भी दिखाई देता है। 2026 के दौरान बीजिंग ने तेहरान के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंध बनाए रखे हैं, लेकिन साथ ही मध्य पूर्व में अपने अन्य साझेदारों और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की स्थिरता को भी प्राथमिकता दी है। हाल में रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि सऊदी अरब की अपील के बाद चीन ने ईरान से हूती गतिविधियों को नियंत्रित करने का आग्रह किया, क्योंकि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में अस्थिरता चीन के ऊर्जा और व्यापार हितों को प्रभावित कर सकती है।

इससे चीन-ईरान रिश्ते की एक महत्वपूर्ण विशेषता सामने आती है: दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग गहरा है, लेकिन इसे औपचारिक सैन्य गठबंधन के रूप में देखना अलग बात है। अमेरिकी-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के अनुसार, बीजिंग ने ईरान के साथ कोई औपचारिक रक्षा प्रतिबद्धता नहीं की है और उसका समर्थन व्यापक क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए सीमित और संतुलित रहा है।

ऐसे में, चीन और ईरान के संबंधों को केवल ‘रणनीतिक साझेदारी’ या ‘दूरी’ के एक शब्द में समझने के बजाय आर्थिक निर्भरता, तेल व्यापार, अमेरिकी प्रतिबंधों, खाड़ी देशों के साथ चीन के संबंधों और बीजिंग की व्यापक पश्चिम एशिया नीति के संदर्भ में देखना अधिक सटीक तस्वीर पेश करता है।