यमन युद्ध में सैन्य भागीदारी पाकिस्तान पर पड़ सकती है भारी, आर्थिक संसाधनों की कमी बनी बड़ी चुनौतीBy IANS Fri, 09 October 2026 04:49 PM

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पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है और यमन युद्ध में भी खाड़ी देश की मदद कर रहा है। हालांकि, एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान की यह रणनीति लंबे समय तक टिकाऊ साबित नहीं हो सकती। रिपोर्ट के अनुसार, पहले से आर्थिक संकट और वित्तीय दबाव से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए अतिरिक्त सैन्य तैनाती बड़ी चुनौती बन सकती है।

‘वन वर्ल्ड आउटलुक’ में एंड्रयू विल्सन के एक लेख में पाकिस्तान के यमन युद्ध में शामिल होने के फैसले को वित्तीय और रणनीतिक जरूरत से ज्यादा जोखिम उठाने वाला कदम बताया गया है। लेख के मुताबिक, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के कार्यक्रम, खाड़ी देशों से मिलने वाली वित्तीय सहायता और विदेशों में काम करने वाले पाकिस्तानियों की ओर से भेजी जाने वाली रकम पर निर्भर है। ऐसे में जिस खाड़ी क्षेत्र में वह अपनी सैन्य भूमिका बढ़ा रहा है, वहां युद्ध का विस्तार उसकी आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा सकता है।

लेख में कहा गया है कि सैन्य तैनाती से पाकिस्तान के उन संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा, जिनकी जरूरत उसे भारत के साथ पूर्वी सीमा की सुरक्षा और देश के भीतर चल रहे दो विद्रोहों से निपटने के लिए पहले से है। इसके अलावा, पाकिस्तान अब तक संघर्ष में सीधे उतरने से बचते हुए मध्यस्थ की भूमिका बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। यमन युद्ध में उसकी बढ़ती भागीदारी इस संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है।

सऊदी अरब में पाकिस्तानी सैन्य तैनाती

मई में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में पाकिस्तानी सुरक्षा और सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया था कि इस्लामाबाद ने सऊदी अरब में करीब 8,000 सैनिक, लगभग 16 विमानों का एक स्क्वाड्रन, दो ड्रोन स्क्वाड्रन और चीन निर्मित एचक्यू-9 वायु रक्षा प्रणाली की एक बैटरी तैनात की थी। विमानों में मुख्य रूप से जेएफ-17 लड़ाकू विमान शामिल बताए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, इस तैनाती का खर्च रियाद उठा रहा था, जबकि सैन्य उपकरणों का संचालन पाकिस्तानी कर्मी कर रहे थे।

सूत्रों ने यह भी दावा किया था कि गोपनीय समझौते में सैनिकों की संख्या बढ़ाकर 80,000 तक करने का प्रावधान था। हालांकि, इस्लामाबाद ने इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपनी सैन्य मौजूदगी की पुष्टि जरूर की थी। अप्रैल से किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों की मौजूदगी भी सामने आई थी।

लेख के अनुसार, सऊदी अरब की वित्तीय मदद से सैनिकों के भत्ते और सैन्य संचालन का खर्च उठाया जा सकता है, लेकिन इससे नष्ट हुए विमानों या वायु रक्षा प्रणालियों की जगह तुरंत नए उपकरण नहीं मिल जाते। इसी तरह, आर्थिक सहायता से यमन में सैन्य कार्रवाई के राजनीतिक और रणनीतिक जोखिम भी खत्म नहीं होते।

रक्षा बजट पर बढ़ता दबाव

रिपोर्ट में पाकिस्तान की वित्तीय स्थिति को सैन्य विस्तार की राह में बड़ी बाधा बताया गया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पाकिस्तान सरकार ने रक्षा सेवाओं के मद में 3 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये, यानी करीब 10.8 अरब डॉलर आवंटित किए हैं। यह शुरुआती 2.55 लाख करोड़ रुपये के आवंटन से लगभग 18 प्रतिशत अधिक है और अनुमानित जीडीपी का करीब 2.1 प्रतिशत है।

रक्षा सेवाओं का आवंटन संघीय बजट के कुल 18.8 लाख करोड़ रुपये का लगभग 16 प्रतिशत है। सैन्य पेंशन के लिए अलग से 82,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वहीं, सरकारी कर्ज पर ब्याज भुगतान लगभग 8 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो रक्षा सेवाओं के बजट से ढाई गुने से भी अधिक है।

लेख के मुताबिक, इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान के बजट पर पहले से ही भारी दबाव है। ऐसे में यमन में सैन्य गतिविधियों को लंबे समय तक जारी रखने के लिए अतिरिक्त धन जुटाना आसान नहीं होगा।

आईएमएफ की मदद पर निर्भर अर्थव्यवस्था

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को लेकर लेख में कहा गया है कि देश को आईएमएफ से मिलने वाली वित्तीय सहायता के लिए निर्धारित शर्तों का पालन करना पड़ रहा है। इनमें जीडीपी के 2 प्रतिशत के बराबर प्राथमिक बजट अधिशेष हासिल करना और विकास संबंधी खर्च पर नियंत्रण बनाए रखना शामिल है।

इन शर्तों के बीच किसी बड़े अतिरिक्त सैन्य अभियान के लिए अलग से धन जुटाने की गुंजाइश सीमित रह जाती है। सैन्य खर्च बढ़ने पर सरकार को दूसरे मदों में कटौती करनी पड़ सकती है या अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तलाशने पड़ सकते हैं।

लेख में वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पाकिस्तान की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 3.6 से 3.7 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया गया है। ऊर्जा क्षेत्र में आए झटके के बाद सितंबर में महंगाई दर लगभग 10.3 प्रतिशत बताई गई। सितंबर के अंत में विदेशी मुद्रा भंडार करीब 21.5 अरब डॉलर था। यह 2023 के संकट के दौरान दर्ज निचले स्तर से बेहतर है, लेकिन लेख के अनुसार, यह भंडार केवल कुछ महीनों के आयात की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है।

खाड़ी देशों की मदद से मिल रही राहत

पाकिस्तान की वित्तीय स्थिरता में सऊदी अरब की सहायता की अहम भूमिका है। लेख के अनुसार, पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक में सऊदी अरब की लगभग 8 अरब डॉलर की जमा राशि है। जुलाई में स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने बताया था कि रियाद ने इसमें से 5 अरब डॉलर की जमा राशि को दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया है। इसके अलावा, वसंत ऋतु में 3 अरब डॉलर की एक अन्य जमा राशि की अवधि भी बढ़ाई गई थी।

लेख में कहा गया है कि इन वित्तीय व्यवस्थाओं से पाकिस्तान की तत्काल विदेशी वित्तपोषण जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है, लेकिन इससे उसकी बाहरी वित्तीय निर्भरता समाप्त नहीं होती। देश की वित्तपोषण जरूरतें अब भी बड़ी हैं और जमा राशि तथा वाणिज्यिक कर्ज पर उसकी निर्भरता बनी हुई है।

कुल मिलाकर, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सऊदी अरब से मिलने वाली आर्थिक मदद पाकिस्तान को सैन्य तैनाती का खर्च उठाने में राहत दे सकती है, लेकिन लंबे समय तक युद्ध में शामिल रहने की वित्तीय और रणनीतिक चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकती। पाकिस्तान के लिए मुख्य चुनौती खाड़ी क्षेत्र में अपने सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने और घरेलू आर्थिक स्थिरता तथा दूसरी सीमाओं की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना होगी।