
मुंबई। भारतीय घरेलू शेयर बाजारों में विदेशी निवेशकों का प्रवाह एक बार फिर रफ्तार पकड़ रहा है और लंबी अवधि के लिहाज से बाजारों का परिदृश्य मजबूत बना हुआ है। यह जानकारी शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के अनुसार, रुपये में कमजोरी के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) फिलहाल सतर्क बने रह सकते हैं। अनुमान है कि मुद्रा के एक से दो महीने तक स्थिर रहने के बाद ही विदेशी निवेशकों की वापसी देखने को मिलेगी।
रिपोर्ट में कहा गया, “हालांकि हमारा मानना है कि यह अस्थायी उतार-चढ़ाव है। दीर्घकालिक दृष्टि से घरेलू निवेश प्रवाह का आउटलुक मजबूत बना हुआ है।”
कम नाममात्र ब्याज दरों और डेट म्यूचुअल फंड्स से टैक्स लाभ हटने के कारण फिक्स्ड इनकम विकल्प लंबी अवधि के निवेशकों के लिए आकर्षक नहीं रह गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जब तक बाजार में गहरी और लंबे समय तक चलने वाली गिरावट नहीं आती—जिसकी संभावना फिलहाल कम है—तब तक इक्विटी में घरेलू निवेश का प्रवाह निरंतर और मजबूत बना रहने की उम्मीद है।
घरेलू बचत में इक्विटी की हिस्सेदारी पिछले 12 महीनों में स्थिर रही है। इससे पहले मार्च 2016 से सितंबर 2024 के बीच नौ वर्षों में यह हिस्सेदारी 17 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
इस स्थिरता का मुख्य कारण बाजार की चाल को माना गया है। सितंबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच बीएसई-500 इंडेक्स में 6.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, हालांकि इस अवधि में निवेश प्रवाह मजबूत बना रहा।
रिपोर्ट में कहा गया, “हम इसे एक अस्थायी रुकावट मानते हैं और उम्मीद करते हैं कि अगले 10 वर्षों में घरेलू बचत में इक्विटी की हिस्सेदारी बढ़कर 45 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसमें महीने-दर-महीने (एम2एम) प्रभाव की बड़ी भूमिका होगी। यह रुझान भारत के बाजारों की स्थिरता के लिए अहम है, क्योंकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) की हिस्सेदारी पहले ही एफपीआई से अधिक है और उन्होंने विदेशी निवेशकों की बिकवाली के दौरान बाजार में उतार-चढ़ाव को थामने में अहम भूमिका निभाई है।”
रिपोर्ट के अनुसार, एफपीआई और डीआईआई के संयुक्त पोर्टफोलियो विश्लेषण से पता चलता है कि विदेशी निवेशक अब भी बड़े शेयरों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किए हुए हैं और वित्तीय क्षेत्र में उनका ओवरवेट बना हुआ है।
वहीं, घरेलू बचत में सोने की हिस्सेदारी पिछले 12 महीनों में 855 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 45.6 प्रतिशत हो गई है, जिसका मुख्य कारण महीने-दर-महीने सोने की कीमतों में आई तेजी है।
हालांकि रिपोर्ट में कहा गया कि इसका बड़ा नकारात्मक असर देखने को नहीं मिलेगा। आंकड़े यह संकेत नहीं देते कि इससे उपभोग में कोई बड़ा उछाल आया हो, न ही इसका इक्विटी में नए निवेश प्रवाह पर कोई खास प्रभाव पड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐतिहासिक रूप से सोने की कीमतों और इक्विटी निवेश प्रवाह के बीच कोई मजबूत संबंध नहीं पाया गया है।
With inputs from IANS