अमेरिकी टैरिफ झटके से कोयंबटूर–तिरुपुर उद्योग बेहाल, रोजगार पर गहरी मारBy Admin Sat, 17 January 2026 07:53 AM

चेन्नई- कभी भारत के सबसे सक्रिय औद्योगिक केंद्रों में शुमार रहे कोयंबटूर और तिरुपुर आज हाल के दशकों के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ ने इन क्षेत्रों के उद्योगों, रोजगार और निर्यात पर गहरा नकारात्मक असर डाला है।

पिछले वर्ष अगस्त में अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाकर 50 प्रतिशत किए जाने के बाद से इन दोनों शहरों की स्थिति लगातार बिगड़ती गई है। कोयंबटूर और तिरुपुर मिलकर तमिलनाडु और अन्य राज्यों के लाखों श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराते थे।

उद्योग सूत्रों के अनुसार, केवल वस्त्र और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में ही अब तक दो लाख से अधिक नौकरियां खत्म हो चुकी हैं। यदि कास्टिंग, पंप और औद्योगिक वाल्व जैसे सहायक उद्योगों को भी शामिल किया जाए, तो प्रभावित लोगों की संख्या तीन लाख से अधिक बताई जा रही है।

छोटी और मझोली निर्यात इकाइयों में फैक्ट्रियों का बंद होना, शिफ्टों में कटौती और ऑर्डर बुक का सिमटना आम बात हो गई है। इसका सीधा असर निर्यात पर भी पड़ा है।

एक निजी मिल में परिधान निर्यात संचालन और व्यवसाय विकास के उपाध्यक्ष धनबालन के अनुसार, पहले कोयंबटूर और तिरुपुर से अमेरिका को होने वाला वार्षिक वस्त्र निर्यात लगभग 1.7 अरब डॉलर का था। उन्होंने कहा, “आज यह आंकड़ा करीब एक अरब डॉलर घट चुका है।”

उन्होंने चेतावनी दी, “यदि भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैरिफ जारी रहा, तो एक साल के भीतर अमेरिका को होने वाला वस्त्र निर्यात लगभग शून्य हो सकता है।”

उद्योग जगत का कहना है कि केवल 50 प्रतिशत टैरिफ ही समस्या नहीं है। इसके अलावा अन्य मानक शुल्क भी लगाए जाते हैं, जो डिलीवर्ड ड्यूटी पेड (डीडीपी) कीमत में जुड़ जाते हैं।

इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की अंतिम कीमत काफी बढ़ जाती है। इसके विपरीत, चीन और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को डीडीपी शर्तों पर लगभग 30 प्रतिशत तक की लागत बढ़त हासिल है, जिससे भारतीय उत्पाद कम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब खबरें आईं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं, जो रूस से तेल खरीदना जारी रखते हैं।

धनबालन ने कहा, “जब 50 प्रतिशत टैरिफ ही असहनीय है, तो 500 प्रतिशत टैरिफ को झेलना लगभग असंभव होगा। यदि ऐसा प्रस्ताव लागू होता है, तो अमेरिका को निर्यात और घटेगा और रोजगार में भारी गिरावट आएगी।”

अमेरिकी बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच निर्यातक भारतीय सरकार और उद्योग संगठनों से वैकल्पिक बाजारों को तेजी से मजबूत करने की मांग कर रहे हैं।

धनबालन ने कहा, “आने वाले समय में यूरोपीय संघ और ब्रिटेन को प्रमुख बाजारों के रूप में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। विविधीकरण अब इस क्षेत्र के निर्यात-आधारित उद्योगों के अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी हो गया है।”

वैश्विक व्यापार तनाव बढ़ने के साथ, कोयंबटूर और तिरुपुर के औद्योगिक श्रमिकों का भविष्य अनिश्चितता के घेरे में नजर आ रहा है।

 

With inputs from IANS