भारत-ईयू व्यापार समझौते से वॉशिंगटन में बढ़ी चिंता, अमेरिका के हाशिये पर जाने की आशंकाBy Admin Thu, 29 January 2026 06:23 AM

वॉशिंगटन: भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के बाद वॉशिंगटन में असहजता साफ दिखाई दे रही है। प्रभावशाली सांसदों, शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों और नीति विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि इस समझौते के चलते अमेरिका वैश्विक व्यापार परिदृश्य में पीछे छूट सकता है।

इस व्यापार समझौते के जरिए नई दिल्ली और ब्रसेल्स वैश्विक व्यापार और रणनीतिक समीकरणों को नया आकार देंगे—ऐसा मानते हुए अमेरिकी हलकों में चिंता बढ़ गई है।

एरिजोना से डेमोक्रेटिक सीनेटर मार्क केली ने कहा कि यह समझौता अमेरिका के सहयोगी देशों में वॉशिंगटन की व्यापार नीति को लेकर बढ़ती नाराजगी को दर्शाता है। उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “ईयू ने भारत के साथ व्यापार और सुरक्षा समझौता किया है। कनाडा और ब्रिटेन चीन के साथ बातचीत कर रहे हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने हमारे सहयोगियों को अलग-थलग कर दिया है।”

केली ने चेतावनी दी कि ऐसे कदमों की कीमत अमेरिका को चुकानी पड़ेगी। उन्होंने कहा, “हमारे सहयोगी अन्य देशों के साथ जो समझौते कर रहे हैं, उसका असर हम पर पड़ता है और यह असर अच्छा नहीं है।”

भारत-ईयू समझौते की घोषणा इस सप्ताह नई दिल्ली में की गई। दोनों पक्षों के नेताओं ने इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा व्यापार समझौता बताया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लेयेन ने इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” करार दिया।

उन्होंने कहा कि यह समझौता “दो अरब लोगों का एक मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाता है, जिससे दोनों पक्षों को लाभ होगा।” वैश्विक व्यापार तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में यह करार दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ता है।

ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी यूरोप के इस कदम पर नाराजगी जताई। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने शुल्क (टैरिफ) के मुद्दे पर वॉशिंगटन के साथ कदम से कदम मिलाकर न चलने के लिए ईयू की आलोचना की।
सीएनबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “उन्हें वही करना चाहिए जो उनके लिए बेहतर हो। लेकिन मुझे यूरोप का रवैया बेहद निराशाजनक लगा। वे हमारे साथ उच्च टैरिफ पर सहमत नहीं हुए और अंत में उन्होंने यह व्यापार समझौता कर लिया।”

वॉशिंगटन के नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता अमेरिकी व्यापार रणनीति के लिए एक चेतावनी है। इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन फाउंडेशन (ITIF) ने कहा कि यह सौदा दिखाता है कि अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आगे बढ़ रही हैं, जबकि अमेरिका पीछे रह जाता है।

आईटीआईएफ में व्यापार, बौद्धिक संपदा और डिजिटल प्रौद्योगिकी शासन के एसोसिएट डायरेक्टर रोड्रिगो बाल्बोंटिन ने कहा, “भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता वॉशिंगटन के लिए एक वेक-अप कॉल होना चाहिए।” उनके अनुसार, अन्य देश टैरिफ घटाकर नए व्यापार नियम तय कर रहे हैं और अमेरिका “हाशिये पर” खड़ा है।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते में कुछ कमियां हैं। उनके मुताबिक, यूरोप के कुछ डिजिटल नियम, खासकर डिजिटल मार्केट्स एक्ट, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं। वहीं भारत को उन्होंने बौद्धिक संपदा संरक्षण और प्रवर्तन के लिहाज से अब भी चुनौतीपूर्ण अर्थव्यवस्था बताया।

इसके बावजूद बाल्बोंटिन ने कहा कि इस समझौते से अमेरिका को परोक्ष लाभ भी हो सकता है। “अगर यह समझौता आंतरिक बाधाओं को कम करता है, तो अंततः इससे अमेरिका को भी फायदा हो सकता है,” उन्होंने कहा।

आईटीआईएफ ने भारत और ईयू के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों का स्वागत किया। बाल्बोंटिन ने कहा, “बढ़ते संरक्षणवाद से भरे वैश्विक व्यापार तंत्र में, दो बड़े लोकतंत्रों के बीच मुक्त व्यापार समझौते का हम स्वागत करते हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि “इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती चीन की व्यापारिक नीतियां हैं।”

कुछ अन्य व्यापार विशेषज्ञों ने समझौते के प्रभाव को लेकर संयम बरतने की सलाह दी। अमेरिका के पूर्व व्यापार अधिकारी मार्क लिंसकॉट ने इसे एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया, लेकिन अतिशयोक्ति से बचने को कहा।

अटलांटिक काउंसिल के लिए लिखते हुए लिंसकॉट ने कहा, “भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता निश्चित रूप से ध्यान देने योग्य है, लेकिन इसके वैश्विक व्यापार या आर्थिक वृद्धि को पूरी तरह बदल देने की संभावना कम है।”
उनके अनुसार, कई लाभ चरणबद्ध टैरिफ कटौती और नियामकीय स्थिरता के जरिए धीरे-धीरे सामने आएंगे। कृषि, बौद्धिक संपदा अधिकार और ईयू का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म जैसे संवेदनशील मुद्दों को आगे की बातचीत के लिए छोड़ा गया है।

उन्होंने यह भी बताया कि समझौते को अब घरेलू मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिसमें ईयू सदस्य देशों और यूरोपीय संसद की स्वीकृति शामिल है।

वॉशिंगटन के नजरिए से लिंसकॉट ने कहा कि यह समझौता अमेरिका के व्यापार संबंधों को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं है। “ऐसा कोई कारण नहीं कि यह अमेरिका के ईयू या भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को कमजोर करे,” उन्होंने लिखा। उनके अनुसार, यह अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की दिशा में गति भी पैदा कर सकता है।

भारत और ईयू के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन टैरिफ, बाजार पहुंच और नियमों को लेकर वर्षों तक गतिरोध बना रहा। वर्ष 2021 में बातचीत दोबारा शुरू हुई।

आज भारत और ईयू मिलकर वैश्विक आर्थिक उत्पादन के पांचवें हिस्से से अधिक का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस समझौते का पूरा असर सामने आने में समय लगेगा, लेकिन वॉशिंगटन की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि जैसे-जैसे साझेदार आगे बढ़ रहे हैं, अमेरिका को अपनी व्यापार रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

 

With inputs from IANS