
मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 2026-27 की पहली तिमाही (Q1) और दूसरी तिमाही (Q2) के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को क्रमशः 6.9 प्रतिशत और 7.0 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को यह घोषणा की।
विकास दर के अनुमान में वृद्धि के कारणों को बताते हुए मल्होत्रा ने कहा कि सेवा क्षेत्र में लगातार मजबूती, जीएसटी में सुधार, रबी फसल की बेहतर संभावनाएं, मौद्रिक नरमी और नियंत्रित मुद्रास्फीति का माहौल निजी खपत को मजबूती देगा। उन्होंने कहा कि उच्च क्षमता उपयोग, अनुकूल वित्तीय परिस्थितियां, वित्तीय संस्थानों और कॉरपोरेट क्षेत्र की मजबूत बैलेंस शीट, तेज ऋण वृद्धि और सरकार द्वारा पूंजीगत व्यय पर लगातार जोर निवेश गतिविधियों को गति प्रदान करेगा।
उन्होंने कहा कि मजबूत घरेलू मांग से निजी क्षेत्र में नए निवेश को बढ़ावा मिलने की संभावना है। सेवा क्षेत्र के निर्यात मजबूत बने रहने की उम्मीद है, जबकि अमेरिका के साथ संभावित व्यापार समझौते से वस्तु निर्यात को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
मल्होत्रा ने यह भी कहा कि यूरोपीय संघ के साथ व्यापक व्यापार समझौता, साथ ही न्यूजीलैंड और ओमान के साथ व्यापार समझौते, निर्यात के विविधीकरण और बाहरी क्षेत्र को मजबूत बनाने में सहायक होंगे। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक व्यापार वातावरण में अनिश्चितता, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक वस्तु कीमतों में अस्थिरता जैसी चुनौतियां जोखिम पैदा कर सकती हैं।
उन्होंने बताया कि प्रथम अग्रिम अनुमान (एफएई) के अनुसार 2025-26 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। कुल आर्थिक वृद्धि में निजी खपत और स्थिर निवेश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हालांकि, आयात निर्यात से अधिक रहने के कारण शुद्ध बाहरी मांग का प्रभाव नकारात्मक रहा है। आपूर्ति पक्ष में वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में 7.3 प्रतिशत की वृद्धि सेवा क्षेत्र की मजबूती, कृषि क्षेत्र की स्थिरता और विनिर्माण गतिविधियों में सुधार से संभव हुई है।
बाहरी मोर्चे पर उन्होंने कहा कि 2025 में वैश्विक अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय मजबूती दिखाई, जिसे व्यापार गतिविधियों में तेजी, शुल्कों के अपेक्षाकृत कम प्रभाव, व्यापक वित्तीय प्रोत्साहन और अनुकूल मौद्रिक नीति का समर्थन मिला।
उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति धीरे-धीरे कम होने की दिशा में है, हालांकि कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह अभी भी लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। मजबूत आर्थिक आंकड़ों के कारण अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम हुई है, जिससे वहां बॉन्ड यील्ड में बढ़त देखी जा रही है। तकनीकी शेयरों में लगातार निवेश के कारण वैश्विक शेयर बाजार में तेजी बनी हुई है, हालांकि वित्तीय दबाव, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और अलग-अलग मौद्रिक नीतियां बाजार में उतार-चढ़ाव का कारण बन रही हैं।
With inputs from IANS