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भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है और इसका असर औद्योगिक रियल एस्टेट बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। देश में मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी औद्योगिक संपत्तियों की कुल लीजिंग अब 6.9 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच गई है। 2021 से इसमें 49 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई है।
कमर्शियल रियल एस्टेट सेवा कंपनी जेएलएल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में औद्योगिक स्थानों की लीजिंग में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 2030 तक बढ़कर करीब 40 फीसदी हो सकती है। यह बदलाव देश के औद्योगिक रियल एस्टेट बाजार की बदलती तस्वीर को दर्शाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मैन्युफैक्चरिंग अब थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स (3PL) के बाद औद्योगिक संपत्तियों का दूसरा सबसे बड़ा उपयोगकर्ता वर्ग बन गया है। इससे संकेत मिलता है कि भारत में औद्योगिक रियल एस्टेट की मांग अब केवल लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उत्पादन गतिविधियों के लिए आधुनिक औद्योगिक परिसरों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है।
2025 में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र ने 1.92 करोड़ वर्ग फुट औद्योगिक जगह लीज पर ली। वहीं, 2026 की पहली छमाही में यह आंकड़ा 1.02 करोड़ वर्ग फुट रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 19 फीसदी अधिक है।
जेएलएल के अनुसार, 2030 तक मैन्युफैक्चरिंग लीजिंग का सालाना अवशोषण लगभग 4.6 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में इसे भारत के वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत बताया गया है। यह रुझान देश की विजन 2047 की महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप भी देखा जा रहा है।
जेएलएल इंडिया के इंडस्ट्रियल एंड लॉजिस्टिक्स कारोबार के प्रबंध निदेशक योगेश शेवाड़े ने कहा कि भारत के औद्योगिक परिदृश्य में मैन्युफैक्चरिंग रियल एस्टेट के विकास के पीछे दो अलग लेकिन एक-दूसरे के पूरक मॉडल काम कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि टियर-1 शहरों में कंपनियां ग्रेड-ए औद्योगिक सुविधाओं को लीज पर लेने को प्राथमिकता दे रही हैं। इसकी बड़ी वजह कम समय में उत्पादन शुरू करने की जरूरत और शुरुआती पूंजीगत खर्च को सीमित रखना है। महंगी और सीमित उपलब्धता वाली जमीन के कारण कंपनियों के लिए तैयार आधुनिक सुविधाओं को लीज पर लेना अधिक व्यावहारिक विकल्प बन रहा है।
इसके विपरीत, टियर-2 शहरों में कंपनियां जमीन खरीदने पर ज्यादा जोर दे रही हैं। इससे उन्हें अपनी जरूरत के मुताबिक प्लांट और अन्य औद्योगिक सुविधाएं विकसित करने के साथ-साथ लंबे समय तक संचालन पर अधिक नियंत्रण मिलता है।
शेवाड़े के मुताबिक, चाहे कंपनियां औद्योगिक संपत्तियां लीज पर लें या जमीन खरीदकर अपना प्लांट स्थापित करें, दोनों ही रुझान भारत में मैन्युफैक्चरिंग के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। उनके अनुसार, भारत धीरे-धीरे वैश्विक कंपनियों के लिए पसंदीदा उत्पादन केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।
रिपोर्ट की एक और अहम बात यह है कि 2025 में मैन्युफैक्चरिंग लीजिंग का करीब 90 फीसदी हिस्सा ग्रेड-ए संपत्तियों का रहा। इससे पता चलता है कि कंपनियां अब केवल जगह की उपलब्धता नहीं, बल्कि बेहतर निर्माण गुणवत्ता, स्वच्छता, सुरक्षा और आधुनिक मानकों से लैस औद्योगिक परिसरों को प्राथमिकता दे रही हैं।
मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की दिलचस्पी अब बड़े महानगरों से आगे भी बढ़ रही है। लखनऊ, जयपुर, चंडीगढ़ ट्राई-सिटी, भुवनेश्वर, गुवाहाटी, सूरत, नागपुर, नासिक, गोवा, इंदौर, संभाजीनगर, तूतीकोरिन, कोयंबटूर और विशाखापत्तनम जैसे करीब 14 उभरते बाजारों में कंपनियां लीजिंग के बजाय जमीन खरीदने की रणनीति अपना रही हैं।
यह क्षेत्रीय अंतर बताता है कि भारत में औद्योगिक विस्तार का मॉडल एक जैसा नहीं है। जहां बड़े शहरों में कंपनियां तैयार और उच्च गुणवत्ता वाली सुविधाओं के जरिए तेजी से उत्पादन शुरू करना चाहती हैं, वहीं उभरते शहरों में जमीन की उपलब्धता और अपेक्षाकृत कम लागत उन्हें अपने दीर्घकालिक औद्योगिक परिसरों के लिए जमीन खरीदने का विकल्प दे रही है।
कुल मिलाकर, मैन्युफैक्चरिंग लीजिंग में लगातार तेज वृद्धि भारत के औद्योगिक ढांचे में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत है। बढ़ती घरेलू मांग, वैश्विक कंपनियों की भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाने की रुचि और आधुनिक औद्योगिक बुनियादी ढांचे की जरूरत मिलकर देश को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन में और महत्वपूर्ण भूमिका दिला सकती है।