
Photo: IANS
भारत की बैंकिंग व्यवस्था में नकदी की उपलब्धता तेजी से घटकर लगभग शून्य के स्तर पर पहुंच गई है। सरकारी खातों में बढ़ते बैलेंस, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और त्योहारों से पहले नकदी की बढ़ती मांग ने सिस्टम की लिक्विडिटी पर दबाव बढ़ा दिया है। एक्सिस बैंक की आर्थिक शोध टीम की एक रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, नकदी की उपलब्धता में आई कमी के कारण ओवरनाइट ब्याज दरें बढ़ी हैं और रिजर्व बैंक को तरलता प्रबंधन के लिए वैरिएबल रेट रेपो (VRR) जैसे उपायों का फिर से सहारा लेना पड़ रहा है। बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का स्तर इस बात को प्रभावित करता है कि बैंकों के पास कर्ज देने और अन्य वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कितनी धनराशि उपलब्ध है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा दबाव की एक बड़ी वजह केंद्र सरकार के खातों में जमा राशि का बढ़ना है। मौसमी रुझानों के अनुसार, दिसंबर की शुरुआत में कुछ दिनों के लिए सरकारी बैलेंस घटने से बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता सुधर सकती है। हालांकि, त्योहारों के दौरान करेंसी नोटों की बढ़ती मांग और रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा बाजार में जारी हस्तक्षेप से इस राहत का असर सीमित रह सकता है।
रिजर्व बैंक जब रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर खरीदता या बेचता है, तो इसका घरेलू बैंकिंग सिस्टम की नकदी पर भी असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी मुद्रा परिचालन और नकदी की मांग से होने वाली निकासी के कारण टिकाऊ लिक्विडिटी घटकर बैंकों की नेट डिमांड एंड टाइम लायबिलिटीज (NDTL) के 3.2 प्रतिशत पर आ गई है। NDTL में बैंकों की मांग पर देय और समयावधि वाली जमा देनदारियां शामिल होती हैं।
हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि वास्तविक समय में बैंकिंग सिस्टम की नकदी पर मौजूदा दबाव की प्रमुख वजह सरकार के खातों में जमा राशि का ऊंचा स्तर है। ऐसे में दिसंबर की शुरुआत में मिलने वाली संभावित राहत के बावजूद निकट भविष्य में लिक्विडिटी पर दबाव बने रहने की आशंका है।
त्योहारी सीजन में लोगों और कारोबारियों की ओर से नकदी की मांग बढ़ना भी एक महत्वपूर्ण कारक है। रिपोर्ट के अनुसार, बाजार में अधिक करेंसी नोटों की मांग के साथ पहले निकाले गए नोटों का बैंकिंग सिस्टम में वापस नहीं आना भी नकदी की उपलब्धता को सीमित कर सकता है।
जमा और कर्ज की वृद्धि के बीच बढ़ सकता है अंतर
लिक्विडिटी में कमी का असर बैंकों की जमा राशि और कर्ज वितरण की रफ्तार पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि जमा वृद्धि की दर फिर से कर्ज वृद्धि की दर से नीचे जा सकती है। ऐसा होने पर बैंकों के लिए अपने कर्ज वितरण को जारी रखने के लिए पर्याप्त धन जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कर भुगतान और विदेशी मुद्रा परिचालन से जुड़ी नकदी निकासी का असर मुख्य रूप से बैंकिंग सिस्टम की जमा राशि पर पड़ता है। इसके विपरीत, खुले बाजार में प्रतिभूतियों की बिक्री (OMO Sales) के मामले में नकदी का प्रभाव अलग हो सकता है, क्योंकि इनमें विक्रेता के रूप में बैंक भी शामिल होते हैं।
जब सिस्टम की लिक्विडिटी सामान्य स्तर की ओर लौटती है, तो जमा वृद्धि की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है। इससे जमा और कर्ज की वृद्धि के बीच अंतर दोबारा बढ़ने की संभावना है। बैंकों को अपनी वित्तीय जरूरतों के लिए अधिक महंगे स्रोतों से धन जुटाना पड़ सकता है।
बाजार की ब्याज दरों पर भी दबाव
एक्सिस बैंक की रिपोर्ट में बाजार की ब्याज दरों में पहले से हो रही बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया गया है। इसके पीछे डॉलर की उपलब्धता और फॉरवर्ड बाजार की परिस्थितियों, आरबीआई के नए प्रतिबंधों तथा कवरड इंटरेस्ट पैरिटी (CIP) में उलटाव जैसे कारकों को जिम्मेदार बताया गया है। आईपीओ से जुड़ी गतिविधियों के दौरान डॉलर की अतिरिक्त उपलब्धता भी विदेशी मुद्रा फॉरवर्ड बाजार को प्रभावित कर रही है।
कुल मिलाकर, बैंकिंग सिस्टम में नकदी की मौजूदा स्थिति आने वाले समय में बैंकों की फंडिंग लागत और कर्ज देने की क्षमता के लिए महत्वपूर्ण होगी। यदि जमा वृद्धि कर्ज की मांग के अनुरूप नहीं रहती और बाजार से धन जुटाना महंगा होता है, तो बैंकों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। इसका व्यापक असर कर्ज की ब्याज दरों और कारोबारियों तथा उपभोक्ताओं के लिए ऋण की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।