गंगोत्री से गंगासागर तक हुआ भगवामय, पीएम मोदी की झालमूढ़ी ने कर दिया कमालBy Admin Mon, 04 May 2026 07:12 PM

RANCHI : चार दशक पहले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि वो दिन दूर नहीं जब जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जिस बंगाल से जनसंघ की नींव रखी थी वहाँ भी भाजपा की सरकार होगी। अटल जी के कहे हुए इस बात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मे 4 मई 2026 को भाजपा ने कर दिखाया। बंगाल चुनाव मे मिली भाजपा को बड़ी सफलता कोई अप्रत्याशित नहीं है। इस सफलता के पीछे की पटकथा पिछले 15 वर्षों से लिखी जा रही थी। नेपथ्य मे इस पटकथा पर काम कर रहे थे भाजपा के चाणक्य गृह मंत्री अमित शाह, प्रभारी और केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव, सह प्रभारी मंगल पांडे और संगठन महामंत्री सुनील बंसल। इन चारों नेताओं ने इस बार जो चक्रव्यूह तैयार किया उसे भेदना बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी के लिए मुश्किल हो गया। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव मे भाजपा को बंगाल मे महज 3 सीटें मिली थी। उस समय यह कहा जा रहा था कि जब्तक ममता है तबटक बंगाल मे भाजपा अपनी पैठ नहीं जमा सकेगी। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव मे भाजपा ने 77 सीटों पर सफलता पाई। इस चुनाव मे भाजपा को उत्तर बंगाल मे सफलता तो मिली लेकिन दक्षिण बंगाल मे दीदी के सामने नहीं तिक पाई। तब अमित शाह के नेतृत्व मे भाजपा ने ममता बनर्जी के हृदय स्थली पर प्रहार करने की रणनीति बनाई और ममता के गढ़ को ही धवस्त कर दिया। पिछले एक दशक में अमित शाह भाजपा के लिए सबसे सफल चुनावी रणनीतिकार के रूप में साबित हुए हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के लिए रणनीति बनाने से लेकर हाल ही में बिहार और अब पश्चिम बंगाल तक उनकी पहचान बनी है माइक्रो-मैनेजमेंट, बूथ स्तर की इंजीनियरिंग और डेटा-आधारित रणनीति से। शाह ने चुनावों की रणनीति को हमेशा बूथ स्तर तक जाकर आकार दिया है, जहां कुछ सौ वोटों का अंतर भी निर्णायक होता है।  केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बंगाल दौरा एक सामान्य चुनाव प्रचार नहीं था। वे 15 दिन बंगाल में रहे। यहां वे सिर्फ रैलियां करने के लिए नहीं, बल्कि एक पूरा वॉर रूम चलाने के लिए मौजूद थे। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसा उन्होंने पिछले साल बिहार चुनाव में किया था। उनके दौरे उत्तर बंगाल, जंगलमहल, सीमावर्ती जिलों और औद्योगिक पट्टियों में बारीकी से मैप किए गए थे। पार्टी ने करीब 100-120 जीतने योग्य और 80-100 प्रतिस्पर्धी सीटों की पहचान की थी और शाह का पूरा प्रचार कार्यक्रम इन्हीं सीटों के इर्द-गिर्द बुना गया था। हर जोन में रात 1-2 बजे तक संगठन की बैठकें होती थीं।
नतीजा यह हुआ कि बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बनाने जा रही है तो वहीं तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी ने कमाल कर दिया है। बंगाल और तमिलनाडु दोनों ही राज्यों में बदलाव के साथ दो सबसे शक्तिशाली क्षेत्रीय नेताओं को गहरा धक्का लगा है। इन नेताओं की हार का असर आने वाले लोकसभा चुनाव और विपक्षी एकता पर भी पड़ना तय है। बीजेपी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के चौथे कार्यकाल की उम्मीदों पर पानी फेर दिया  तो वहीं तमिलनाडु में स्टालिन अपनी कुर्सी गंवा बैठे हैं और टीवीके प्रमुख थलपति विजय का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय है।

इंडिया गठबंधन की आगे की राह और भी मुश्किल
स्टालिन और ममता बनर्जी दोनों विपक्षी इंडिया गठबंधन के सबसे प्रमुख चेहरों में से हैं। दोनों नेता अब तक अपने-अपने राज्यों में भाजपा के विस्तार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे साथ ही ममता बनर्जी को अक्सर नरेंद्र मोदी के संभावित राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता है। पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस की कई हार के बाद विपक्ष के चेहरे के रूप में राहुल गांधी के नाम पर इंडिया गठबंधन के भीतर ही सवाल थे। वहीं अब ममता बनर्जी और स्टालिन को चुनाव में जो झटका लगा है वह इंडिया गठबंधन  की स्थिति को और जटिल बना देगा।
2024 के बाद राज्यों में तेजी से बढ़ता बीजेपी का ग्राफ
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी अकेले अपने दम पर सरकार बनाने से चूक गई थी। बीजेपी जितनी सीटों की उम्मीद लगाए बैठी थी उसके मुताबिक उसे सफलता नहीं मिली। साथ ही यह सवाल उठने लगे कि बीजपी की स्थिति अब कमजोर हो रही है लेकिन लोकसभा के बाद कई राज्यों में बीजेपी ने जीत हासिल इस आकलन को गलत साबित कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद बीजेपी ने महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, दिल्ली और ओडिशा सहित कई राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत की है। पश्चिम बंगाल में मिली जीत ने इस दायरे को और भी बढ़ाया है।
आज आए नतीजों में जहां तमिलनाडु में न केवल डीएमके की हार हुई बल्कि सीएम एमके स्टालिन अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। डीएमके ने 2021 में एआईएडीएमके को हराकर सत्ता में वापसी की और 234 में से 133 सीटें जीतीं। लेकिन यह चुनाव तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य में एक बदलाव लेकर आया है। वहीं बंगाल में 2011 में ममता बनर्जी सत्ता में आईं और उन्होंने लेफ्ट के तीन दशक के शासन का अंत किया। बीजेपी की बढ़ती चुनौती के बावजूद उन्होंने 2016 और 2021 में अपनी स्थिति मजबूत की। लेकिन अब चौथी बार जीत का सपना टूट गया।
विजय तमिलनाडु के हीरो, बदली सियासी तस्वीर
तमिलनाडु में लंबे समय से डीएमके और एआईएडीएमके का वर्चस्व रहा लेकिन इस चुनाव में टीवीके के उदय ने कई राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। राजनीतिक विश्लेषक टीवीके की लोकप्रियता में इस उछाल का एक बड़ा कारण विजय की व्यक्तिगत लोकप्रियता को मानते हैं, खासकर युवा और महिला मतदाताओं के बीच। थलपति के नाम से जाने जाने वाले विजय ने तीन दशकों के फिल्मी करियर में अपनी दमदार फैन फॉलोइंग के साथ राजनीति में कदम रखा और अब पहले ही चुनाव के बाद उनका राज्य का अगला सीएम बनना लगभग तया है।
देश मे लेफ्ट का एकमात्र किला भी धवस्त 
15 साल पहले देश मे लेफ्ट का सबसे बड़ा किला बंगाल था जिसे ममता बनर्जी ने धवास्त कर दिया था। इसके बाद भाजपा ने त्रिपुरा से भी लेफ्ट को खदेड़ दिया। लेफ्ट का एकमात्र किला केरलम बच हुआ था। यहाँ काँग्रेस ने इस बार उसे बुरी तरह से पटखनी दी है। यूडीएफ ने दस साल बाद केरल में सत्ता में वापसी का मार्ग प्रशस्त किया है। एलडीएफ को मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में हार का सामना करना पड़ा।  एलडीएफ सरकार को अपनी कमजोरियों के चलते हार का सामना करना पड़ा। सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोपों ने एलडीएफ की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया। एलडीएफ सरकार को 10 साल के शासन के बाद स्वाभाविक सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा। हालांकि, दूसरे कार्यकाल में कोरोना महामारी के दौरान किए गए अच्छे कार्यों से कुछ हद तक फायदा मिला था। लेकिन, सबरीमाला सोना चोरी विवाद ने सरकार की प्रतिष्ठा को धूमिल किया। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और उनके दामाद-बेटी पर भ्रष्टाचार के सीधे आरोप लगे। इन आरोपों से मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत छवि भी काफी खराब हुई, जिससे पार्टी को नुकसान हुआ। इन घटनाओं ने सरकार की जनधारणा को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। केरल में कांग्रेस पार्टी ने अपनी आंतरिक एकजुटता बनाए रखी। वीडी सतीशन, एके एंटनी और शशि थरूर जैसे प्रमुख नेताओं ने मिलकर काम किया। वायनाड में हुए एक हादसे ने एलडीएफ सरकार की कमजोरियों को उजागर किया।वायनाड हादसे के बाद राहुल और प्रियंका के लगातार दौरों ने पार्टी को मजबूती दी। इन प्रयासों से कांग्रेस जनता के बीच अपनी खोई हुई पकड़ फिर से बनाने में सफल रही।