
झारखंड समेत पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों में परिसीमन के दौरान आदिवासी समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित न हो, इसे लेकर पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने केंद्र सरकार के सामने अपनी मांग रखी है। सोमवार, 27 अक्टूबर को नई दिल्ली में उन्होंने केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन और विशेषज्ञों की कानूनी राय सौंपी। इस मुलाकात में ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक शशि पन्ना भी मौजूद रहे।
आरक्षित सीटों का मौजूदा अनुपात बनाए रखने की मांग
बंधु तिर्की ने कहा कि परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ती है, तो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होनी चाहिए। उनका कहना है कि ऐसा नहीं होने पर झारखंड सहित दूसरे राज्यों में आदिवासी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी पर असर पड़ सकता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 330(2) और 332(3) में जरूरी संशोधन करने का आग्रह किया, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों का वर्तमान अनुपात सुरक्षित रखा जा सके।
पांच राज्यों की तरह झारखंड को भी मिले संरक्षण
बंधु तिर्की ने प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक, 2026 (विधेयक संख्या 107) का हवाला देते हुए कहा कि अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा के लिए विशेष प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे। ऐसे में झारखंड समेत अन्य पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों में भी आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए समान प्रकृति के संवैधानिक और कानूनी प्रावधान किए जाने चाहिए।
उन्होंने जोर दिया कि पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों की ऐतिहासिक, सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर परिसीमन कानून में स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे आदिवासी समुदाय के अधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व प्रभावित न हों।
2007 के परिसीमन का दिया उदाहरण
बंधु तिर्की ने वर्ष 2007 की परिसीमन प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय झारखंड विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों को 28 से घटाकर 22 और लोकसभा की आरक्षित सीटों को 5 से घटाकर 4 करने का प्रस्ताव सामने आया था। इसके विरोध में राज्य में आंदोलन और प्रदर्शन हुए थे। हालांकि, संबंधित वैधानिक प्रावधानों के कारण यह कटौती लागू नहीं हो सकी।
उन्होंने कहा कि पिछले अनुभव को देखते हुए भविष्य में आदिवासी आरक्षित सीटों का अनुपात सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी संवैधानिक प्रावधान जरूरी हैं।
राज्यपाल, TAC और राष्ट्रीय आयोग की भूमिका पर जोर
ज्ञापन में परिसीमन से जुड़े अहम फैसलों में पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों के राज्यपालों, जनजातीय सलाहकार परिषदों यानी TAC और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) की भूमिका को उचित महत्व देने की मांग भी की गई है।
इसके साथ ही संविधान के अनुच्छेद 338A(9) के अनुरूप अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत मामलों में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से परामर्श सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
बंधु तिर्की ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में जरूरी संशोधन या पूरक कानूनी व्यवस्था बनाने और परिसीमन के आदिवासी समुदाय पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग भी रखी।
केंद्रीय मंत्री ने ज्ञापन पर लिया संज्ञान
मुलाकात के दौरान केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने ज्ञापन और उसमें उठाए गए कानूनी पहलुओं पर संज्ञान लिया। उन्होंने कहा कि इस विषय पर किसी तरह के स्पष्टीकरण या अतिरिक्त जानकारी की जरूरत पड़ने पर संपर्क किया जाएगा।
बंधु तिर्की ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार परिसीमन से जुड़े आगामी कानूनों और नीतिगत फैसलों में आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखेगी।
इस मुलाकात में ‘परिसीमन का आदिवासी समाज पर प्रभाव एवं संभावित समाधान’ शीर्षक रिपोर्ट भी सौंपी गई। इसके अलावा झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता शुभाशिष रसिक सोरेन और एनयूएसआरएल, रांची के सहायक प्राध्यापक रामचंद्र उरांव के कानूनी अभिमत भी केंद्रीय मंत्री को दिए गए।