
— नित्यानंद शुक्ला
भारतीय विश्वविद्यालयों की कल्पना ऐसे स्थानों के रूप में की गई थी जहाँ युवा बिना भय के तर्क कर सकें, बिना दंड के असहमति जता सकें और बिना पूर्वाग्रह के विकसित हो सकें। वे लोकतंत्र की प्रयोगशालाएँ थीं, संदेह और आरोपों की अदालतें नहीं।
लेकिन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नई कैंपस-भेदभाव संबंधी गाइडलाइंस इन संस्थानों को निरंतर भय के क्षेत्रों में बदलने का खतरा पैदा कर रही हैं—विशेष रूप से सामान्य या तथाकथित “उच्च जाति” वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के लिए।
हालाँकि इस नए ढाँचे का घोषित उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की रक्षा करना है, लेकिन इसकी भाषा और संरचना एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है:
क्या सामूहिक अपराधबोध को संस्थागत बनाकर सामाजिक न्याय प्राप्त किया जा सकता है?
देशभर में छात्रों, अभिभावकों और शैक्षणिक समुदायों द्वारा हो रहे विरोध यह संकेत देते हैं कि बहुत से लोग इसका उत्तर “नहीं” मानते हैं। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है, जहाँ वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु जैन ने इन गाइडलाइंस को चुनौती दी है और तर्क दिया है कि ये संविधान में निहित समानता, निष्पक्षता और विधिक प्रक्रिया के अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
यह बहस जातिगत भेदभाव की वास्तविकता को नकारने की नहीं है।
यह बहस इस बात की है कि UGC द्वारा सुझाया गया इलाज कहीं बीमारी से अधिक खतरनाक तो नहीं।
UGC के इस कदम की भावनात्मक और राजनीतिक पृष्ठभूमि सर्वविदित है।
रोहित वेमुला की मृत्यु को संस्थागत भेदभाव के प्रतीक के रूप में देखा गया और इसने उच्च शिक्षा में जाति, विशेषाधिकार और बहिष्करण पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी।
इसी तरह, विभिन्न विश्वविद्यालयों की मुस्लिम छात्राओं ने पहचान के आधार पर भेदभाव, सामाजिक अलगाव और अपमान के अनुभव साझा किए।
2019 के बाद से ये मुद्दे बार-बार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठे हैं। इन घटनाओं ने आत्ममंथन और सुधार की माँग की—और वह आवश्यक भी थी।
लेकिन जब नीतियाँ संतुलन और प्रमाण के बजाय आक्रोश और अपराधबोध से संचालित होती हैं, तो अक्सर वे अति-सुधार (Overcorrection) की शिकार हो जाती हैं। नई UGC गाइडलाइंस उसी अति-सुधार का उदाहरण प्रतीत होती हैं।
नई व्यवस्था के तहत SC, ST और OBC (जिसमें कुछ मुस्लिम जाति समूह भी शामिल हैं) के छात्रों को व्यापक सुरक्षा दी गई है। यदि किसी छात्र को यह अनुभव हो कि:
किसी जाति-सूचक शब्द का प्रयोग हुआ या संकेत दिया गया
व्यवहार “प्रतिकूल” या बहिष्करणकारी था
उसकी “मानवीय गरिमा” आहत हुई
तो वह शिकायत दर्ज करा सकता है, और आरोपी—जो प्रायः सामान्य वर्ग से माना जाता है—तुरंत जाँच के घेरे में आ सकता है।
प्रारंभिक चरण में ठोस प्रमाण
मंशा (Intent) का स्पष्ट निर्धारण
प्रारंभिक कार्रवाई से पहले सुनवाई की गारंटी
इस प्रकार, प्रमाण की जगह अनुभूति और जाँच से पहले आरोप की स्थिति बन जाती है।
प्रदर्शनकारियों में प्रचलित एक पंक्ति इस भय को संक्षेप में कहती है:
SC/ST/OBC जन्म से पीड़ित माने जाते हैं, और सामान्य वर्ग जन्म से अपराधी।
SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम अपने उद्देश्य के कारण नहीं, बल्कि उसके दुरुपयोग के कारण विवादित रहा है। स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्वीकार किया है कि इस कानून के अंतर्गत झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर मामले दर्ज हुए हैं, जिनसे निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी, सामाजिक अपमान और वर्षों की कानूनी लड़ाई हुई।
नई UGC गाइडलाइंस को और अधिक खतरनाक इसीलिए माना जा रहा है क्योंकि:
OBC को भी शामिल कर दायरा अत्यधिक बढ़ा दिया गया है
“इक्विटी स्क्वाड” जैसे निगरानी तंत्र विश्वविद्यालयों को सीखने के स्थान के बजाय निगरानी-राज्य बना देते हैं
“प्रतिकूल व्यवहार” और “मानवीय गरिमा” जैसी परिभाषाएँ इतनी लचीली हैं कि लगभग हर असहमति अपराध बन सकती है
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं छोड़ा गया है।
जहाँ पहले जानबूझकर झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान था, अब वह समाप्त हो चुका है।
परिणामस्वरूप:
शिकायतकर्ता को कोई जोखिम नहीं
आरोपी को तत्काल मानसिक, सामाजिक और पेशेवर क्षति
प्रक्रिया ही सजा बन जाती है
यह व्यवस्था ब्लैकमेल, बदले और दबाव की संभावनाएँ खोल देती है।
सार्वजनिक विमर्श में यह स्वीकार नहीं किया जाता कि सामान्य/उच्च जाति के छात्र-शिक्षक भी गाली-गलौज, धमकी और सामाजिक बहिष्कार का शिकार होते हैं।
“सवर्ण विरोधी” नारे और अपमान को अक्सर “राजनीतिक प्रतिरोध” कहकर जायज़ ठहराया जाता है।
नई गाइडलाइंस इस असंतुलन को और बढ़ाती हैं—जहाँ एक पक्ष का उत्पीड़न अदृश्य है और दूसरे की प्रतिक्रिया अपराध।
सबसे बड़ा खतरा कानूनी नहीं, मनोवैज्ञानिक है।
एक शिकायत का डर मेरिट, स्वतंत्र सोच और ईमानदार शिक्षण को कुचल देता है।
अंक बढ़ाने का दबाव
बहस में चुप्पी
असहमति से बचाव
इतिहास बताता है कि झूठे मामलों और सामाजिक बहिष्कार ने आत्महत्याओं को जन्म दिया है। ऐसी किसी भी नीति पर प्रश्न उठना चाहिए जो इस जोखिम को बढ़ाती हो।
संविधान ऐतिहासिक अन्याय को मान्यता देता है, लेकिन सामूहिक नैतिक अपराधबोध को नहीं।
अनुच्छेद 14 समानता और अनुच्छेद 21 विधिक प्रक्रिया की गारंटी देता है—सभी के लिए।
पहचान-आधारित दोषारोपण संवैधानिक नैतिकता नहीं, पहचान-राजनीति है।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के लिए एक निर्णायक क्षण है।
विष्णु जैन की याचिका अदालत को यह अवसर देती है कि वह दो बातों में संतुलन बनाए:
वंचितों की वास्तविक सुरक्षा
प्राकृतिक न्याय और निष्पक्ष प्रक्रिया
विश्वविद्यालय भय में नहीं चल सकते।
न्याय पहचान से नहीं, कर्म से तय होता है।
यदि नई UGC गाइडलाइंस:
आरोप को प्रमाण से ऊपर रखती हैं
पहचान को तथ्य से बड़ा बनाती हैं
जाँच से पहले दंड देती हैं
तो वे न केवल एक वर्ग को, बल्कि भारतीय उच्च शिक्षा की आत्मा को क्षति पहुँचाएँगी।
शिक्षा-संस्थानों में कानून का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, दमन नहीं
समानता का अर्थ “उलटा भेदभाव” नहीं हो सकता
झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान अनिवार्य होना चाहिए
इक्विटी सेल्स संवाद और समाधान के मंच हों, पुलिस इकाई नहीं
हर शिकायत का मूल्यांकन प्रमाण-आधारित हो, पहचान-आधारित नहीं
सामाजिक न्याय और प्राकृतिक न्याय परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं
यदि चाहें, मैं इसे:
संक्षिप्त संपादकीय,
डिबेट नोट,
लीगल ब्रीफ,
या हिन्दी समाचार-लेख
के रूप में भी ढाल सकता हूँ।
हिन्दी समाचार-लेख
नीचे इसे संतुलित, तथ्यात्मक और समाचार-पत्र शैली में लिखा गया हिन्दी समाचार-लेख प्रस्तुत है। भाषा जानबूझकर संयमित रखी गई है ताकि यह समाचार, विश्लेषण और जनहित विमर्श—तीनों की कसौटी पर खरा उतरे।
नई दिल्ली।
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गहन बहस के केंद्र में है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में जारी की गई कैंपस भेदभाव-रोधी नई गाइडलाइंस को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों में असंतोष और विरोध के स्वर तेज़ हो गए हैं। छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के एक वर्ग का आरोप है कि इन दिशा-निर्देशों के कारण सामाजिक न्याय के उद्देश्य से आगे बढ़ते हुए व्यवस्था असंतुलित हो गई है और यह सामान्य अथवा तथाकथित उच्च जाति वर्ग के लिए भय का कारण बन रही है।
UGC का कहना है कि इन गाइडलाइंस का उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों को भेदभाव से सुरक्षा देना और परिसरों में समानता सुनिश्चित करना है। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि इन नियमों की भाषा और संरचना कई संवैधानिक प्रश्न खड़े करती है।
इन गाइडलाइंस को वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु जैन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि नए नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करते हैं। अदालत से आग्रह किया गया है कि वह यह जाँच करे कि क्या UGC ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था बना दी है, जिसमें पहचान के आधार पर दोष मान लिया जाता है।
UGC के इस कदम की पृष्ठभूमि में बीते वर्षों की कई घटनाएँ रही हैं। रोहित वेमुला की मृत्यु के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों में कथित जातिगत भेदभाव पर देशव्यापी बहस छिड़ी थी। इसके अलावा, विभिन्न विश्वविद्यालयों में मुस्लिम छात्राओं द्वारा सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव के आरोप लगाए गए। इन घटनाओं ने नीति-निर्माताओं पर दबाव बनाया कि परिसरों को अधिक समावेशी बनाया जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि सुधार की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन नीति-निर्माण यदि संतुलन के बजाय भावनात्मक दबाव में हो, तो वह नई समस्याएँ पैदा कर सकता है।
नई व्यवस्था के तहत यदि SC, ST या OBC वर्ग का कोई छात्र यह अनुभव करता है कि उसके साथ जाति-आधारित शब्दों का प्रयोग हुआ, व्यवहार “प्रतिकूल” रहा या उसकी मानवीय गरिमा को ठेस पहुँची, तो वह शिकायत दर्ज करा सकता है। शिकायत के बाद प्रारंभिक जाँच में आरोपी पक्ष को तत्काल सफाई देने की स्थिति में आना पड़ता है।
आलोचकों की आपत्ति यह है कि:
प्रारंभिक चरण में ठोस प्रमाण की अनिवार्यता नहीं है
मंशा (इंटेंट) का स्पष्ट निर्धारण नहीं होता
झूठी शिकायतों पर दंड का कोई प्रावधान नहीं है
इससे यह आशंका जताई जा रही है कि प्रक्रिया ही दंड बन सकती है।
कई शिक्षाविद इन गाइडलाइंस की तुलना SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम से कर रहे हैं, जिसे लेकर स्वयं न्यायपालिका ने समय-समय पर दुरुपयोग की संभावना स्वीकार की है। उनका कहना है कि नई गाइडलाइंस का दायरा इससे भी व्यापक है, क्योंकि इसमें OBC वर्ग को भी शामिल किया गया है और यह सीधे अकादमिक निर्णयों—जैसे अंक, मूल्यांकन और बहस—पर असर डाल सकती हैं।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि इन नियमों के कारण अध्यापक स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करने या संवेदनशील विषयों पर चर्चा करने से हिचक सकते हैं। वहीं, छात्रों में भी यह डर है कि असहमति या सामान्य अकादमिक टकराव को भेदभाव का रूप दिया जा सकता है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि परिसरों में भय और संदेह का वातावरण बनता है, तो उसका सीधा असर सीखने की प्रक्रिया और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
कानूनी विशेषज्ञों और शिक्षाविदों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि सामाजिक न्याय और प्राकृतिक न्याय परस्पर विरोधी नहीं हैं। उनका सुझाव है कि:
शिकायतों की स्पष्ट परिभाषा हो
स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित की जाए
झूठी शिकायतों पर भी उत्तरदायित्व तय किया जाए
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। न्यायालय के फैसले से यह तय होगा कि उच्च शिक्षा में समानता और निष्पक्षता के बीच संतुलन कैसे साधा जाएगा। यह विवाद केवल एक नियमावली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय विश्वविद्यालयों की आत्मा, शैक्षणिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हुआ प्रश्न बन चुका है।