
आधुनिक भारत में एक ऐसा नैरेटिव लगातार फैलाया जा रहा है कि ब्राह्मण और तथाकथित ऊँची जातियों ने सदियों तक अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को सत्ता, सम्मान और अवसरों से वंचित रखा। यह धारणा न केवल एकांगी है, बल्कि भारतीय इतिहास के प्रामाणिक तथ्यों से भी मेल नहीं खाती। भारत का इतिहास किसी एक जाति के प्रभुत्व या दमन की कहानी नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों की साझी भागीदारी, शासन और सहयोग का दस्तावेज़ है।
700 ईसा पूर्व से ही भारत में OBC और आदिवासी पृष्ठभूमि से आए शासकों का प्रभुत्व रहा है। मगध के नंद वंश—विशेषकर महापद्म नंद और धनानंद—को प्राचीन ग्रंथों में शूद्र या पिछड़े वर्ग से जोड़ा गया है। महापद्म नंद को “एकच्छत्र सम्राट” कहा गया, जिसने उत्तर भारत के कई राजवंशों को पराजित कर विशाल साम्राज्य खड़ा किया।
इसके बाद चंद्रगुप्त मौर्य, जिन्हें कई इतिहासकार मुरा या मोरिय (आदिवासी/OBC) समुदाय से जोड़ते हैं, ने यूनानी आक्रमणकारियों को खदेड़कर भारत का पहला संगठित साम्राज्य स्थापित किया। सम्राट अशोक ने सामाजिक न्याय, धर्म सहिष्णुता और लोककल्याण को राज्य नीति का आधार बनाया—जो किसी जातीय वर्चस्व नहीं, बल्कि समावेशी शासन का उदाहरण है।
प्राचीन भारत में अन्य प्रमुख OBC और जनजातीय शासकों में
शुंग और कण्व काल के कई क्षेत्रीय शासक,
सातवाहन वंश (आंध्र क्षेत्र, जिन्हें OBC मूल से जोड़ा जाता है),
इक्ष्वाकु वंश के कई शासक शामिल थे।
मध्यकाल में OBC और आदिवासी शासकों की भूमिका और भी स्पष्ट होती है।
गुर्जर-प्रतिहार वंश (गुर्जर – OBC),
यादव वंश (देवगिरी के शासक),
अहीर वंश (रावण और बाद के क्षेत्रीय शासक),
कुर्मी और कुशवाहा शासक,
जाट शासक (भरतपुर के महाराजा सूरजमल),
मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज (मराठा – OBC),
गोंड, भील, संथाल, मुंडा जैसे आदिवासी राजाओं ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावी शासन किया।
गोंडवाना के राजा रानी दुर्गावती, संथाल विद्रोह के सिदो-कान्हू, और भील शासक राजा पूंजा आदिवासी नेतृत्व के ऐतिहासिक उदाहरण हैं, जिन्होंने शासन और प्रतिरोध दोनों में अहम भूमिका निभाई।
इसके समानांतर, ब्राह्मणों की भूमिका को केवल “दमनकारी वर्ग” के रूप में चित्रित करना भी ऐतिहासिक रूप से गलत है। आचार्य चाणक्य (कौटिल्य)—एक ब्राह्मण—ने किसी जातीय हित के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की रक्षा और स्थिरता के लिए चंद्रगुप्त मौर्य जैसे युवा को तैयार किया। अर्थशास्त्र में योग्यता, कर्तव्य और जनकल्याण को सर्वोच्च स्थान दिया गया, न कि जन्म-आधारित भेदभाव को।
इतिहास बताता है कि सत्ता अक्सर OBC और आदिवासी शासकों के हाथों में रही, जबकि ब्राह्मणों ने शिक्षक, मार्गदर्शक, प्रशासक और वैचारिक स्तंभ की भूमिका निभाई। यह सहयोग ही भारत की सभ्यता की असली पहचान रहा है।
आज ज़रूरत है इतिहास को हथियार बनाने की नहीं, बल्कि तथ्यों के साथ ईमानदार संवाद की। ब्राह्मण बनाम OBC या SC-ST जैसी विभाजनकारी सोच भारत की ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है। भारत का अतीत साझा नेतृत्व, सह-अस्तित्व और सामूहिक राष्ट्र-निर्माण की कहानी है—और वही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है।