
भोपाल/नई दिल्ली: उच्च शिक्षा में आरक्षण और एडमिशन नियमों को लेकर विवाद एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की कथित तौर पर भेदभावपूर्ण गाइडलाइंस पर अंतरिम रोक लगाने के बावजूद, मोहन यादव के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने राज्य स्तर पर ऐसी ही गाइडलाइंस लागू कर दी हैं।
इस फैसले पर सामान्य वर्ग के छात्रों और कई संगठनों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि नई व्यवस्था में उनके लिए कोई राहत या संतुलन का प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का दखल
सूत्रों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में UGC की गाइडलाइंस पर अस्थायी रोक लगा दी थी, जिसे याचिकाकर्ताओं ने भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन बताया था। कोर्ट ने इस मामले पर केंद्र सरकार और UGC से जवाब मांगा था।
कोर्ट ने कहा था कि शिक्षा से जुड़े नियम बनाते समय समाज के सभी वर्गों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि नई गाइडलाइंस एडमिशन और भर्ती प्रक्रियाओं में सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के अवसरों को प्रभावित कर रही हैं।
मध्य प्रदेश सरकार का नया कदम
इस बीच, मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है। आलोचकों का कहना है कि ये गाइडलाइंस काफी हद तक UGC की उन गाइडलाइंस जैसी ही हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई थी।
राज्य सरकार का तर्क है कि यह फैसला सामाजिक न्याय और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लिया गया है। हालांकि, विरोध करने वाले संगठनों का आरोप है कि यह नीति एकतरफा है और सामान्य वर्ग के हितों की अनदेखी करती है।
राजनीतिक बयानबाजी तेज़
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज़ हो गई है। विपक्षी पार्टियों ने कहा है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने UGC की गाइडलाइंस पर सवाल उठाया था, तो राज्य सरकार को ऐसे नियम लागू करने से बचना चाहिए था।
दूसरी ओर, बीजेपी नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार की नीति पूरी तरह से संवैधानिक ढांचे के भीतर है और इसका मकसद किसी के अधिकारों को कम करना नहीं, बल्कि समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों को अवसर प्रदान करना है। विशेषज्ञों की राय
शिक्षा नीति विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र और राज्य सरकारों की अलग-अलग नीतियों से छात्रों और संस्थानों में भ्रम पैदा हो सकता है। उनका कहना है कि इस मुद्दे पर अंतिम स्पष्टता सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत फैसले के बाद ही सामने आएगी।
फिलहाल, सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ संगठनों ने संकेत दिया है कि वे मध्य प्रदेश सरकार के नए नोटिफिकेशन को भी कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। इसलिए, आने वाले दिनों में यह मुद्दा शिक्षा नीति और राजनीतिक बहस दोनों का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।