
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार को एक अहम निर्देश देते हुए कहा है कि वह एक सप्ताह के भीतर विषय विशेषज्ञों की एक समिति गठित करे। यह समिति एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में कानूनी अध्ययन से जुड़े पाठ्यक्रम को अंतिम रूप देने का काम करेगी। यह निर्देश उस याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका से जुड़ी कथित आपत्तिजनक सामग्री पर सवाल उठाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि उसका उद्देश्य न्यायपालिका की स्वस्थ और वस्तुनिष्ठ आलोचना को रोकना नहीं है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में संस्थाओं की रचनात्मक आलोचना जरूरी होती है, क्योंकि इससे व्यवस्था मजबूत होती है। लेकिन जब ऐसी सामग्री स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में शामिल की जाती है, तो उसे संतुलित, तथ्यात्मक और जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
दरअसल विवाद कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब के एक अध्याय को लेकर सामने आया था, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ी कुछ टिप्पणियां शामिल थीं। कुछ लोगों का मानना था कि इस तरह की बातें छोटे छात्रों के लिए उपयुक्त नहीं हैं और इससे न्यायपालिका की छवि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी बताया कि विवादित अध्याय पाठ्यपुस्तक विकास टीम द्वारा तैयार किया गया था, जिसकी अध्यक्षता विद्वान प्रोफेसर मिशेल डैनिनो ने की थी। अदालत ने माना कि यह सामग्री शैक्षणिक प्रक्रिया के तहत विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई थी, लेकिन संवेदनशील विषयों को छात्रों के सामने रखते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह कानून, शिक्षा और संवैधानिक अध्ययन के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक समिति बनाए। यह समिति पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की समीक्षा करेगी और स्कूल स्तर पर कानूनी शिक्षा के लिए एक संतुलित और उपयुक्त पाठ्यक्रम तैयार करेगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से स्कूलों में संविधान, कानून और न्यायपालिका से जुड़े मूल्यों की पढ़ाई अधिक व्यवस्थित और प्रभावी तरीके से हो सकेगी, जिससे छात्रों में जागरूकता और आलोचनात्मक सोच दोनों विकसित होंगी।