
ज्ञान रंजन
रांची । झारखंड की सरकार पिछले एक सप्ताह से पूरी तरह से असम मे शिफ्ट है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित राज्य सरकार के लगभग सभी मंत्री भी चुनाव प्रचार मे व्यस्त हैं। झामुमो कोटे मे मंत्री अपने दल के प्रत्याशियों के पक्ष मे पसीना बहा रहे हैं तो काँग्रेस कोटे के मंत्री और नेता अपनी पार्टी के प्रत्याशी को विजयी बनाने मे ताकत झोंके हुए है। उधर झारखंड मे मुख्यमंत्री सहित लगभग पूरी की पूरी सरकार असम मे है इधर सरकार मे शामिल सहयोगी दलों मे तकरार बढ़ी हुई है। काँग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने गोड्डा मे बालू के अवैध खनन को लेकर परोक्ष रूप से हेमंत सरकार मे शामिल राजद कोटे से मंत्री संजय प्रसाद यादव पर हमला बोल दिया है तो संजय प्रसाद यादव ने भी खुली चुनौती दे डाली है। मंत्री संजय प्रसाद यादव ने प्रदीप यादव के बयान पर साफ कहा है कि कौन कर रहा है बालू का अवैध खनन इसकी उच्चस्तरीय जांच हो। उन्होनें यहाँ तक कहा कि यदि अवैध खनन की जांच मे उनका नाम आता है तो वह तत्क्षण मंत्री पद से इस्तीफा देने को तैयार हैं। श्री यादव ने कहा कि वह मुख्यमंत्री से आग्रह करते हैं कि बालू के अवैध खनन की जांच के लिए हाई लेवल कमिटी बनाई जाए। दरअसल मुख्यमंत्री के असम चुनाव मे व्यस्त होने के बाद एक बार फिर काँग्रेस पार्टी मुखर हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष हों या प्रदेश प्रभारी या फिर विधायक दल के नेता सभी लगातार अपनी ही सरकार के खिलाफ आग उगल रहे हैं। काँग्रेस के निशाने पर वही विभाग है जो मुख्यमंत्री के पास है। चाहे वो खान विभाग हो या फिर शिक्षा विभाग।
क्या है काँग्रेस की फुफकार का राज ?
झारखंड मे काँग्रेस की स्थिति दंतहीन-विषहीन सर्प के जैसी है। सच्चाई तो यह है कि काँग्रेस पार्टी पूरी तरह से कलह की शिकार है। काँग्रेस के विधायकों को अपने पार्टी कोटे के मंत्रियों पर भी भरोसा नहीं है। अधिकांश विधायक आलाकमान तक पार्टी कोटे के मंत्रियों की शिकायत कर चुके हैं। पार्टी ने प्रदीप यादव को विधायक दल का नेता तो बना दिया है लेकिन उनकी बातों को विधायक भी तरजीह नहीं देते। प्रदेश प्रभारी की भाषा नेताओं वाली नहीं बल्कि अधिकारियों वाली है। जमीनी कार्यकर्ताओं को कागजी कार्यकर्ता बनाए हुए हैं। केशव महतो कमलेश के प्रदेश अध्यक्ष बने डेढ़ वर्ष हो गए लेकिन अभी तक पुरानी कमिटी से हो काम चला रहे हैं। जिस पार्टी की हालत ऐसी हो और जो पार्टी हेमंत के सहारे विधानसभा मे संख्या बल बढ़ाई हो वही पार्टी अपनी ही सरकार के खिलाफ बोल रही है। दरअसल मूल मुद्दा राज्यसभा चुनाव को लेकर है। वर्ष 2019 से लेकर 2024 तक तीन राज्यसभा के चुनाव हुए लेकिन काँग्रेस पार्टी को मौका नहीं मिला। संख्या बल के हिसाब से देखा जाए तो पिछले विधानसभा के कार्यकाल मे दो सीट जीतने की संख्या महागठबंधन के पास नहीं थी। लेकिन इस बार का सीन कुछ अलग है। इस बार की संख्या बल आसानी से महागठबंधन के दो प्रत्याशी को राज्यसभा भेज सकती है। काँग्रेस पार्टी की फुफकार सिर्फ और सिर्फ राज्यसभा की एक सीट को लेकर है। लेकिन जानकारों का मानना है कि हेमंत सोरेन किसी भी कीमत पर राज्यसभा की सीट काँग्रेस पार्टी को नहीं देने जा रहे हैं।
स्थानीय राजनीति को लेकर है प्रदीप-संजय की अदावत
काँग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और राजद कोटे के मंत्री संजय यादव के बीच की अदावत नई नहीं है। एक समय था जब संजय यादव सिर्फ विधायक थे और प्रदीप यादव बाबूलाल मरांडी कैबिनेट के मंत्री थे। उस समय भी दोनों नेताओं के बीच की तकरार सबों ने देखी है। लेकिन बाद मे प्रदीप यादव भाजपा को छोड़कर झविमो होते हुए काँग्रेस मे आ चुके हैं । अब मजबूरी है कि महागठबंधन मे एक साथ रहने के कारण शांति का मार्ग अपनाएं। प्रदीप यादव को पूरी उम्मीद थी कि जिस तरह से लोकसभा चुनाव के दौरान गोड्डा से दीपिका पाण्डेय सिंह का टिकट काटकर पार्टी ने उनको टिकट दिया था उसी तरह मंत्रिमंडल मे भी ओबीसी कोटे के नाम पर उन्हें इस बार जगह मिल जाएगी। लेकिन हुआ ऐसा नहीं। काँग्रेस कोटे से दीपिका पाण्डेय सिंह ने बाजी मार ली और राजद कोटे से संजय प्रसाद यादव ने। दोनों ही मंत्री गोड्डा जिला से ही हैं। साथ ही दोनों मंत्रियों से प्रदीप यादव की बनती नहीं है। गोड्डा मे अवैध बालू खनन का मामला उठाकर प्रदीप यादव ने एक तीर से दो निशाना साधा है।