
सुनील सिंह रांची : लोकसभा में एक बार फिर महिला आरक्षण बिल गिर गया। अब महिलाओं को राजनीति में 33% आरक्षण के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ेगा। इस बार उम्मीद थी कि महिला आरक्षण बिल और परिसीमन संबंधित बिल पारित हो जाएगा तो इसके कई फायदे होंगे। महिलाओं को राजनीति में भागीदारी मिलेगी और परिसीमन से नए लोगों को राजनीति में सांसद- विधायक बनने का अवसर मिलेगा। विकास को भी गति मिलेगी। लेकिन सारी उम्मीदों पर विपक्ष के नकारात्मक राजनीति और सिर्फ मोदी विरोध के कारण पानी फिर गया।
महिलाओं को न राजनीति में आरक्षण का लाभ मिलेगा और न ही लोकसभा और विधानसभा की सीटें बढ़ेगी। यानी सब कुछ पहले की तरह ही चलता रहेगा। राजनीति में पहले से स्थापित लोगों और परिवारों का ही वर्चस्व रहेगा। आम कार्यकर्ता पार्टी नेताओं के लिए जय-जयकार और चरण वंदना करता रहेगा। आखिर इन महानुभावों और राजनीति में स्थापित नेताओं को आरक्षण की जरूरत क्या है। इनका पूरा परिवार और कुनबा तो राजनीति में स्थापित है ही। अब नए लोगों को आरक्षण का लाभ मिलेगा तो इनका राजनीति पर जो वर्षों से वर्चस्व कायम है वह टूट जाएगा। इसलिए वह आरक्षण का समर्थन क्यों करें।
कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी, उनकी मां सोनिया गांधी, बहन प्रियंका गांधी तो मलाई मार रहे हैं तो फिर दूसरों के लिए रास्ता क्यों खोलें। यही हाल समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राजद के लालू प्रसाद यादव का परिवार, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन का परिवार, महाराष्ट्र में शरद पवार का परिवार व दक्षिण के राज्यों के नेताओं का परिवार सहित अनेक उदाहरण हैं। भारतीय जनता पार्टी भी इससे अछूती नहीं है, लेकिन भाजपा और एनडीए गठबंधन ने महिला आरक्षण और परिसीमन के लिए प्रयास किया इसलिए उनकी चर्चा फिलहाल करना उचित प्रतीत नहीं होता।
अब जब बड़े नेताओं के परिवारों का वर्चस्व स्थापित है तो फिर यह लोग महिला आरक्षण और परिसीमन का समर्थन क्यों करेंगे। इसलिए इन लोगों ने विरोध किया और बिल पास नहीं होने दिया।
झारखंड के संदर्भ में देखें तो यहां अब तक परिसीमन नहीं हुआ है। परिसीमन होता तो लोकसभा और विधानसभा की सीटें बढ़ जाती। नए लोगों को अवसर मिलता। राजनीति में एक नई उम्मीद की किरण जगती। झारखंड के लोकसभा और विधानसभा के क्षेत्र कितने बड़े हैं यह आप सबको पता है।
गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में बताया कि उनका संसदीय क्षेत्र 350 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। कमोबेश चतरा, पलामू सहित अन्य लोकसभा क्षेत्रों की भी यही स्थिति है। विधानसभा क्षेत्र भी बहुत बड़े-बड़े हैं। अगर इनमें बढ़ोतरी होती तो विकास को गति मिलती। क्षेत्र इतने बड़े-बड़े हैं कि 5 साल में भी सांसद-विधायक अपने इलाके में नहीं जा पाते हैं। आप सोचिए की महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पारित नहीं होने का क्या नुकसान हुआ। दक्षिण के राज्यों की राजनीति उत्तर भारत के खिलाफ माहौल बनाकर चल रही है। यह भी लोग नहीं समझ पा रहे हैं। इस विभाजनकारी नीति से देश को ही नुकसान होने वाला है।