
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने शुक्रवार को दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिए। आयोग का यह फैसला फिलहाल अंतरिम है और ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम तथा पार्टी के पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है।
चुनाव आयोग की अधिसूचना के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया गया है और उसके लिए ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया है। इस गुट को पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी गई है।
वहीं, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह मिला है। इस गुट को भी पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी गई है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि नए नाम और चुनाव चिन्ह तब तक लागू रहेंगे, जब तक वह ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ के मूल नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह पर अंतिम फैसला नहीं सुना देता। यानी फिलहाल दोनों गुट आगामी चुनाव अलग-अलग नाम और प्रतीकों के साथ लड़ेंगे।
यह फैसला पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनावों के लिहाज से खास महत्व रखता है। इन सीटों पर मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। इसी तरह, असम की नगांव लोकसभा सीट के उपचुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट का उम्मीदवार ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ के नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चिन्ह के साथ चुनाव लड़ेगा।
यह घटनाक्रम 17 सितंबर को आयोग के उस अंतरिम आदेश के एक दिन बाद आया है, जिसमें दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चिन्ह का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया था। इसके बाद दोनों पक्षों को वैकल्पिक नाम और चुनाव चिन्ह सुझाने के लिए कहा गया था।
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1998 में ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस से अलग होकर की गई थी। तब से पार्टी ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह के साथ सभी चुनाव लड़े हैं। 2011 में पार्टी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई थी और तब से राज्य की राजनीति में उसकी प्रमुख भूमिका रही है।
नए आदेश के बाद पश्चिम बंगाल में 1998 के बाद यह पहला चुनाव होगा जिसमें मतपत्र पर मूल ‘तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसका पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह मौजूद नहीं होगा। हालांकि, यह स्थिति फिलहाल अंतिम नहीं है और मूल नाम व चिन्ह पर चुनाव आयोग का अंतिम फैसला अभी लंबित है।