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नीदरलैंड्स और बेल्जियम में जारी एफआईएच हॉकी विश्व कप में भारतीय महिला टीम जहां अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश में जुटी है, वहीं झारखंड के सिमडेगा, खूंटी और गुमला जैसे जिलों में हॉकी की वही पुरानी परंपरा आज भी गांव-गांव जीवित है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इस प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक संगठित व्यवस्था मौजूद है।
झारखंड लंबे समय से भारतीय हॉकी को प्रतिभाशाली खिलाड़ी देने वाले राज्यों में शामिल रहा है। मौजूदा भारतीय महिला टीम की कप्तान सलीमा टेटे इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। लेकिन उनकी सफलता के पीछे केवल व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं, बल्कि वर्षों से तैयार हुआ एक पूरा खेल तंत्र भी है, जिसमें स्थानीय समुदाय, राज्य सरकार, भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और निजी संस्थानों की भूमिका शामिल है।
आज राज्य में 5,000 से अधिक लड़के और लड़कियां आवासीय तथा गैर-आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए हॉकी की तैयारी कर रहे हैं। इससे झारखंड की पहचान देश की प्रमुख हॉकी नर्सरियों में और मजबूत हुई है।
झारखंड में हॉकी की जड़ें 20वीं सदी के शुरुआती दौर तक जाती हैं। खासकर आदिवासी समुदायों में यह खेल धीरे-धीरे जीवनशैली और स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन गया। इस परंपरा को नई ऊंचाई उस समय मिली, जब जयपाल सिंह मुंडा ने 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम की कप्तानी की।
इसके बाद माइकल किंडो, सिल्वेनस डुंग डुंग, मनोहर टोपनो, अजित लकड़ा, बिमल लकड़ा, बिरेंद्र लकड़ा, असुंता लकड़ा और पूर्व भारतीय कप्तान सुमराई टेटे जैसे खिलाड़ियों ने इस विरासत को आगे बढ़ाया। इन खिलाड़ियों ने सिर्फ पदक नहीं जीते, बल्कि गांवों में पल रहे बच्चों को यह विश्वास भी दिया कि वे एक दिन देश के लिए खेल सकते हैं।
वरिष्ठ कोच जगन टोपनो ने SAI मीडिया से बातचीत में कहा कि खूंटी, सिमडेगा और गुमला के लगभग हर गांव में बच्चों के बीच हॉकी का जुनून दिखाई देता है। सुबह और शाम गांवों के मैदानों में बच्चों को हॉकी खेलते देखा जा सकता है और यह खेल स्थानीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
सिमडेगा को अक्सर भारत की हॉकी नर्सरी कहा जाता है। सीमित सुविधाओं के दौर में भी इस जिले ने लगातार राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार किए। अब यहां प्रतिभाओं को निखारने के लिए पहले से कहीं बेहतर ढांचा मौजूद है।
सिमडेगा में राज्य सरकार का हॉकी आवासीय केंद्र अंडर-12 से अंडर-16 आयु वर्ग के लड़के और लड़कियों को प्रशिक्षण देता है। इसके अलावा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और रेंगारी, जलडेगा तथा कुरडेग में गैर-आवासीय प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित हैं। इन संस्थानों के जरिए हर साल बड़ी संख्या में युवा खिलाड़ियों को व्यवस्थित प्रशिक्षण मिलता है।
यही बदलाव झारखंड की हॉकी कहानी को एक नई दिशा देता है। पहले प्रतिभाएं सीमित संसाधनों के बावजूद आगे आती थीं, लेकिन अब कोशिश यह है कि प्रतिभाओं को बेहतर प्रशिक्षण, सुविधाएं और प्रतियोगिताओं का अनुभव देकर योजनाबद्ध तरीके से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया जाए।
खूंटी भी अब राज्य के प्रमुख हॉकी केंद्रों में अपनी जगह बना चुका है। यहां लड़के और लड़कियों के लिए आवासीय सुविधाओं के साथ 40 बिस्तरों वाला विशेष बालिका छात्रावास भी है। गोविंदपुर, तोरपा, मुरहू, खूंटी और मरांगहादा में गैर-आवासीय प्रशिक्षण केंद्र युवाओं को स्थानीय स्तर पर अभ्यास का अवसर दे रहे हैं।
इसके अलावा गुमला, कामडारा, कोनबीर, रांची, लातेहार, हुलहुंडू और हजारीबाग में भी हॉकी के लिए आवासीय और गैर-आवासीय प्रशिक्षण केंद्र सक्रिय हैं। पूर्वी सिंहभूम में टाटा अकादमी और जमशेदपुर में राष्ट्रीय हॉकी अकादमी ने इस नेटवर्क को और मजबूत किया है।
जगन टोपनो के मुताबिक, झारखंड में हॉकी के विकास में SAI के साथ टाटा समूह की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। टाटा ने ग्रामीण क्षेत्रों में कई प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए हैं, जहां युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने वाले कोचों को आर्थिक सहायता दी जाती है। कुछ केंद्र प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए रहने की सुविधा भी उपलब्ध कराते हैं।
इस पूरे तंत्र में भारतीय खेल प्राधिकरण की भूमिका लगातार बढ़ी है। रांची और हजारीबाग स्थित SAI केंद्र तथा मोराबादी का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस जिला स्तर पर सामने आने वाली प्रतिभाओं को उच्च स्तर के प्रशिक्षण से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
अब प्रशिक्षण केवल मैदान पर हॉकी खेलने तक सीमित नहीं है। खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स साइंस, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग, फिजियोथेरेपी, पोषण, मानसिक तैयारी और उच्च स्तरीय प्रतियोगिताओं का अनुभव भी दिया जा रहा है। इससे खिलाड़ियों के विकास को लंबे समय के नजरिए से देखने की कोशिश की जा रही है।
जगन टोपनो ने बताया कि SAI झारखंड में 10 से 14 वर्ष की उम्र के खिलाड़ियों के लिए अलग-अलग स्थानों पर चयन ट्रायल आयोजित करता है। चयनित खिलाड़ियों को रांची और हजारीबाग के SAI केंद्रों में दाखिला देकर बेहतर प्रशिक्षण दिया जाता है। दूरदराज के आदिवासी गांवों से आने वाले बच्चों के लिए यह व्यवस्था आधुनिक खेल सुविधाओं तक पहुंच का पहला बड़ा अवसर बन सकती है।
इसका असर राष्ट्रीय टीमों में भी दिखाई दे रहा है। निक्की प्रधान, सलीमा टेटे, स्वीटी डुंगडुंग और दीपिका सोरेंग भारतीय महिला टीम में अपनी जगह बना चुकी हैं। जूनियर स्तर पर पार्वती टोपनो, बिनिमा धन, सुगना सांगा, नीलम टोपनो, श्रुति कुमारी और खिल्ली कुमारी जैसी खिलाड़ियों से उम्मीदें बढ़ी हैं। श्रुति कुमारी SAI हजारीबाग की तैयार की हुई खिलाड़ियों में शामिल हैं। पुरुष वर्ग में आशीष तानिपुर्ती जूनियर भारतीय टीम के उभरते खिलाड़ियों में शामिल हैं।
अब झारखंड के इस मजबूत आधार को नई गति मिलने की उम्मीद है। केंद्रीय खेल मंत्रालय की नई Khelo India योजना के तहत 2026-31 की अवधि के लिए 36,441 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछली योजना की तुलना में आठ गुना अधिक है। योजना का लक्ष्य समर्थित खिलाड़ियों की संख्या में भी दस गुना वृद्धि करना है।
योजना में प्रतिभा पहचान, खेल ढांचे का विकास और खेल तकनीक जैसे क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया गया है। राज्यों की भूमिका बढ़ने से झारखंड जैसे राज्यों को भी अपनी मौजूदा खेल व्यवस्था को और विस्तार देने का अवसर मिल सकता है। नई व्यवस्था में राज्य कार्ययोजना के तहत केंद्र और राज्य के बीच 60:40 लागत साझेदारी का प्रावधान है, जबकि वित्तीय सहायता को प्रतिभा की प्रगति, खिलाड़ियों को बनाए रखने, जमीनी स्तर से शीर्ष स्तर तक पहुंचाने और सुधार से जुड़े लक्ष्यों से जोड़ा जाएगा।
झारखंड के लिए यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य के पास पहले से ही एक मजबूत हॉकी संस्कृति और बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली युवा मौजूद हैं। यदि प्रशिक्षण सुविधाओं, प्रतियोगिताओं, पोषण और खेल विज्ञान को गांवों तक लगातार मजबूत किया जाता है, तो अधिक खिलाड़ियों के राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है।
पिछले 16 वर्षों में राज्य की संगठित युवा हॉकी व्यवस्था का असर हॉकी इंडिया की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी देखने को मिला है। खासकर महिला वर्ग में झारखंड ने 34 पदक जीते हैं, जिनमें 10 स्वर्ण, 11 रजत और 13 कांस्य पदक शामिल हैं। यह उपलब्धि बताती है कि राज्य में प्रतिभा का आधार केवल कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है।
हर सुबह सिमडेगा, खूंटी, रांची, हजारीबाग, गुमला और राज्य के दूसरे हिस्सों में हजारों बच्चे हॉकी स्टिक लेकर मैदान पर उतरते हैं। इनमें से हर खिलाड़ी भारतीय टीम तक नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन इसी भीड़ में भविष्य की कोई सलीमा टेटे, निक्की प्रधान या कोई नया अंतरराष्ट्रीय सितारा जरूर छिपा हो सकता है।
झारखंड की हॉकी कहानी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां खेल केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि कई समुदायों के जीवन और संस्कृति का हिस्सा है। अब जब इस पारंपरिक जुनून को बेहतर प्रशिक्षण और संस्थागत समर्थन मिल रहा है, तो गांवों के मैदानों से निकलने वाली प्रतिभाओं के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हॉकी तक पहुंचने का रास्ता पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रहा है।
With inputs from IANS