
नई दिल्ली- लंबे समय तक वायु प्रदूषण के कुछ खास घटकों के संपर्क में रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। एक अध्ययन के अनुसार, पीएम 2.5 में शामिल सल्फेट, अमोनियम, एलिमेंटल कार्बन और मिट्टी की धूल जैसे कण अवसाद (डिप्रेशन) के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
यह अध्ययन जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित हुआ है, जिसमें पाया गया कि यह खतरा विशेष रूप से बुजुर्गों में अधिक है, खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले से हृदय संबंधी, चयापचय (कार्डियोमेटाबॉलिक) या तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियां हैं।
करीब 2.36 करोड़ बुजुर्गों के आंकड़ों पर आधारित इस शोध में इस बात पर जोर दिया गया है कि पीएम 2.5 के खतरनाक घटकों पर लक्षित और सख्त नियंत्रण बेहद जरूरी है, ताकि संवेदनशील आबादी की बेहतर सुरक्षा की जा सके।
अमेरिका की एमोरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा, “हमारे नतीजों से यह स्पष्ट हुआ कि पीएम 2.5 के विभिन्न घटकों का संयुक्त प्रभाव, केवल पीएम 2.5 के कुल द्रव्यमान की तुलना में अवसाद के खतरे को कहीं अधिक बढ़ाता है। इसमें मिट्टी की धूल, सल्फेट और एलिमेंटल कार्बन की भूमिका सबसे अहम पाई गई।”
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को पहले से हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग (जैसे स्ट्रोक और कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर), न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां (जैसे अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया) या श्वसन संबंधी रोग (जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) हैं, उनमें पीएम 2.5 और उसके प्रमुख घटकों के संपर्क में आने पर अवसाद का जोखिम काफी अधिक हो जाता है।
सल्फेट, जो मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के दहन से बनने वाला एक द्वितीयक अकार्बनिक एरोसोल है, आमतौर पर अमोनियम सल्फेट या सल्फ्यूरिक एसिड के रूप में मौजूद रहता है। यह माइटोकॉन्ड्रियल कार्य में गड़बड़ी और ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा कर सकता है, जिससे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है और अवसाद का खतरा बढ़ सकता है।
एलिमेंटल कार्बन, जो मुख्य रूप से वाहनों के धुएं और बायोमास जलने से निकलता है, ऑक्सीडेटिव तनाव और पूरे शरीर में सूजन के जरिए तंत्रिका तंत्र पर विषाक्त प्रभाव डाल सकता है। यातायात से निकलने वाले एलिमेंटल कार्बन के कण बेहद सूक्ष्म होते हैं और आसानी से ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार कर मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं।
मिट्टी की धूल, जिसमें सिलिका और आयरन व कैल्शियम जैसी धातुएं होती हैं, प्राकृतिक और मानव-जनित दोनों स्रोतों से उत्पन्न हो सकती है। इसमें मौजूद भारी धातुएं खून और हड्डियों में जमा होकर तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि नाइट्रेट और ऑर्गेनिक कार्बन का प्रभाव अपेक्षाकृत कम या कुछ मामलों में उल्टा था, जबकि मिट्टी की धूल, एलिमेंटल कार्बन और सल्फेट का सकारात्मक संबंध कहीं अधिक मजबूत दिखा।
शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष में कहा, “हमारे निष्कर्ष संकेत देते हैं कि पहले से मौजूद बीमारियां पीएम 2.5 और उसके घटकों के प्रभाव के साथ मिलकर अवसाद के विकास की प्रक्रिया को और तेज कर सकती हैं।”
With inputs from IANS