
नई दिल्ली- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान, मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक ऐसे प्राकृतिक प्रोटीन की सेमीकंडक्टर क्षमता की खोज की है, जो सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल इलेक्ट्रॉनिक्स का रास्ता खोल सकती है। यह खोज मोबाइल फोन, स्मार्ट वॉच से लेकर चिकित्सा उपकरणों और पर्यावरण सेंसर तक के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।
परंपरागत सेमीकंडक्टर सामग्री, जैसे सिलिकॉन, तकनीकी रूप से बेहद उपयोगी हैं, लेकिन उनकी कुछ सीमाएं भी हैं। ये कठोर होती हैं, इनके निर्माण में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है और ये इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती समस्या में योगदान देती हैं। ऐसे में टिकाऊ, लचीले और जैव-संगत इलेक्ट्रॉनिक्स—जैसे पहनने योग्य उपकरण, इम्प्लांटेबल डिवाइस और ग्रीन सेंसर—की मांग तेजी से बढ़ रही है।
INST के वैज्ञानिकों ने स्वयं-संयोजित होने वाले बैक्टीरियल शेल प्रोटीन पर प्रयोग किया, ताकि यह समझा जा सके कि जो प्रोटीन प्राकृतिक रूप से बड़े, सपाट दो-आयामी (2D) शीट बनाते हैं, उनमें अंतर्निहित इलेक्ट्रॉन घनत्व पैटर्न और एरोमैटिक अवशेष होते हैं या नहीं, और क्या वे स्वाभाविक रूप से प्रकाश-संवेदनशील हो सकते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि जब ये प्रोटीन सपाट, शीट जैसी परतों का रूप लेते हैं, तो वे पराबैंगनी (UV) प्रकाश को अवशोषित करते हैं और बिना किसी अतिरिक्त डाई, धातु या बाहरी ऊर्जा स्रोत के विद्युत धारा उत्पन्न करते हैं। इस तरह ये प्रकाश-संचालित, बिना किसी सहारे के सेमीकंडक्टर की तरह कार्य करते हैं, जैसा कि इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और सेंसर में उपयोग होने वाली सामग्रियां करती हैं।
टीम ने यह भी पाया कि ये प्रोटीन प्राकृतिक रूप से पतली, शीट जैसी संरचनाओं में स्वयं को व्यवस्थित कर लेते हैं। जब उन पर UV प्रकाश पड़ता है, तो सूक्ष्म विद्युत आवेश प्रोटीन की सतह पर गति करने लगते हैं।
शोध टीम की अगुवाई कर रहीं डॉ. शर्मिष्ठा सिन्हा ने छात्र शोधकर्ताओं सिल्की बेदी और एस. एम. रोज़ के साथ बताया, “ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन प्रोटीन में टायरोसिन नामक प्राकृतिक अमीनो एसिड मौजूद होता है, जो प्रकाश से उत्तेजित होने पर इलेक्ट्रॉन छोड़ सकता है। जब ये इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन गति करते हैं, तो प्रोटीन शीट एक विद्युत संकेत उत्पन्न करती है—ठीक उसी तरह जैसे एक सूक्ष्म सोलर सेल काम करता है। यह प्रभाव प्रोटीन की आंतरिक संरचना पर आधारित है और इसमें किसी कृत्रिम पदार्थ या उच्च तापमान वाली निर्माण प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती।”
टीम के अनुसार, यह खोज वास्तविक दुनिया में कई रोमांचक संभावनाएं खोलती है। चूंकि यह सामग्री लचीली और शरीर के अनुकूल है, इसलिए इसका उपयोग पहनने योग्य स्वास्थ्य मॉनिटर, त्वचा के लिए सुरक्षित UV-डिटेक्शन पैच और ऐसे इम्प्लांटेबल मेडिकल सेंसर बनाने में किया जा सकता है, जो मानव शरीर के भीतर सुरक्षित रूप से काम करें।
रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री की पत्रिका केमिकल साइंस में प्रकाशित इस शोध में यह भी बताया गया है कि इन प्रोटीन का उपयोग अस्थायी या डिस्पोजेबल पर्यावरण सेंसर—जैसे प्रदूषण मापक या सूर्यप्रकाश ट्रैकर—के रूप में किया जा सकता है, जो उपयोग के बाद प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते।
भविष्य में परिवारों, मरीजों और उपभोक्ताओं को ऐसे नरम, आरामदायक और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार उपकरणों का लाभ मिल सकता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में सहजता से घुल-मिल जाएं।
With inputs from IANS