सर्दी, प्रदूषण और बदलती जीवनशैली से महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियों में बढ़ोतरीBy Admin Fri, 16 January 2026 05:24 AM

नई दिल्ली: महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियों के मामलों में लगातार इज़ाफा हो रहा है और मौजूदा सर्दी का मौसम तथा बढ़ता वायु प्रदूषण इसके लक्षणों को और गंभीर बना सकता है। यह जानकारी बुधवार को एम्स (AIIMS) दिल्ली की एक विशेषज्ञ ने दी।

एम्स दिल्ली के रूमेटोलॉजी विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. उमा कुमार ने बताया कि ऑटोइम्यून बीमारियां एक जटिल प्रक्रिया के तहत विकसित होती हैं। ये किसी एक अंग तक सीमित हो सकती हैं या फिर पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली (सिस्टमिक) हो सकती हैं।

जहां सीमित ऑटोइम्यून रोग केवल एक अंग, जैसे अग्न्याशय (पैंक्रियास), को प्रभावित करते हैं, वहीं सिस्टमिक बीमारियां शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचाती हैं। इनमें रूमेटॉइड आर्थराइटिस, सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस, स्क्लेरोडर्मा, शोग्रेन सिंड्रोम, IgG4 से जुड़ी बीमारियां सहित लगभग 60 प्रकार के रोग शामिल हैं। ये बीमारियां पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक पाई जाती हैं।

डॉ. कुमार ने बताया, “ये बीमारियां किसी भी उम्र में हो सकती हैं, लेकिन प्रजनन आयु की महिलाओं में अधिक देखने को मिलती हैं। महिला हार्मोन और एक्स क्रोमोसोम पर मौजूद इम्यून से जुड़े जीन इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। कम उम्र में महिला-पुरुष अनुपात काफी अधिक होता है, जो मेनोपॉज के बाद लगभग समान हो जाता है।”

उन्होंने कहा कि किशोरावस्था और युवा उम्र में यह अनुपात 9:1 तक हो सकता है, जबकि 60–70 वर्ष की उम्र के बाद यह लगभग 1:1 हो जाता है।

डॉ. कुमार ने यह भी कहा कि सामाजिक भ्रांतियों के कारण कई बार महिलाओं की अनदेखी की जाती है। अक्सर इन बीमारियों को गलत तरीके से वंशानुगत या संक्रामक मान लिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं है। इसके चलते कई महिलाएं चुपचाप पीड़ा सहती रहती हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ता है।

विशेषज्ञ के अनुसार सर्दियों में इन बीमारियों के लक्षण अधिक बिगड़ जाते हैं। इसके कारणों में ठंडा तापमान, वायुदाब में कमी, जोड़ों में जकड़न, धूप की कमी, विटामिन-डी की कमी, वजन बढ़ना, उदासी, प्रदूषण और वायरल संक्रमण का बढ़ा खतरा शामिल है।

वायु प्रदूषण को एक बड़ा ट्रिगर बताते हुए उन्होंने कहा कि शोध में यह पाया गया है कि अधिक प्रदूषण वाले इलाकों, खासकर व्यस्त सड़कों के पास रहने वाले लोगों में सूजन से जुड़े मार्कर, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और यहां तक कि स्वस्थ व्यक्तियों में भी ऑटोएंटीबॉडीज बढ़ जाती हैं। इससे ऑटोइम्यून बीमारियों और प्रदूषण के बीच मजबूत संबंध सामने आता है।

लगातार मानसिक तनाव और नींद की कमी भी सूजन को बढ़ाती है और बीमारी की सक्रियता को खराब करती है। नाइट शिफ्ट में काम करने वालों में इसका खतरा अधिक रहता है। कोविड के बाद ऑटोइम्यून और सूजन संबंधी बीमारियों में बढ़ोतरी देखी गई है, जो पर्यावरण और जीवनशैली के प्रभाव को और मजबूत करता है।

डॉ. कुमार ने बताया कि अस्वस्थ खानपान, धूम्रपान, तंबाकू सेवन और मोटापा भी इन बीमारियों के जोखिम को बढ़ाते हैं। मोटापा स्वयं एक क्रॉनिक इंफ्लेमेटरी स्थिति है, जो ऑटोइम्यून रोगों की संभावना बढ़ा देता है।

उन्होंने यह भी कहा कि बेहतर जांच सुविधाएं और डॉक्टरों, मरीजों तथा आम लोगों में बढ़ती जागरूकता भी मामलों के अधिक सामने आने का एक कारण है। पिछले एक दशक में जागरूकता अभियानों के चलते इन बीमारियों की पहचान बेहतर हुई है।

डॉ. कुमार के अनुसार ऑटोइम्यून बीमारियां इलाज योग्य हैं, लेकिन आमतौर पर इन्हें जीवनभर प्रबंधन की आवश्यकता होती है, जैसे डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर।

उन्होंने कहा, “इन बीमारियों की पहचान के लिए कोई एक लक्षण या एक जांच पर्याप्त नहीं होती। लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, जिनमें थकान, बुखार, जोड़ों में दर्द, त्वचा पर चकत्ते, बाल झड़ना, आंखों या मुंह में सूखापन, किडनी या तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याएं, या बार-बार गर्भपात शामिल हो सकते हैं। चूंकि स्वस्थ लोगों में भी ऑटोएंटीबॉडी पाई जा सकती हैं, इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के जांच कराना भ्रामक हो सकता है।”

उन्होंने बिना चिकित्सकीय परामर्श के स्टेरॉयड और दर्द निवारक दवाइयों के सेवन से भी सावधान किया और कहा कि हर ऑटोइम्यून बीमारी में इनकी जरूरत नहीं होती।

डॉ. कुमार ने जोर देते हुए कहा कि जीवनशैली में सुधार बेहद जरूरी है। पर्याप्त नींद, तनाव नियंत्रण, नियमित व्यायाम, धूम्रपान छोड़ना और वजन नियंत्रण से बीमारी के दोबारा भड़कने से बचाव होता है। साथ ही उन्होंने योग को भी लाभकारी बताया, जो सूजन कम करने और नींद में सुधार करने में मदद करता है।

 

With inputs from IANS