‘अपरिवर्तनीय, क्रिप्टोग्राफ़िक रूप से सुरक्षित’: सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अभिलेखों के लिए ब्लॉकचेन आधारित डिजिटलीकरण का सुझाव दियाBy Admin Fri, 23 January 2026 05:10 AM

नई दिल्ली - संपत्ति से जुड़े मुकदमों और जालसाजी पर लगाम लगाने के लिए प्रणालीगत सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और देशभर की राज्य सरकारों को भूमि अभिलेखों और पंजीकृत दस्तावेज़ों के डिजिटलीकरण का सुझाव दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि इसके लिए ब्लॉकचेन जैसी सुरक्षित और छेड़छाड़-रोधी तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने एक सिविल अपील को स्वीकार करते हुए की। पीठ ने निचली अपीलीय अदालत के उस फैसले को बहाल किया, जिसमें एक पंजीकृत बिक्री विलेख की वैधता को सही ठहराया गया था और इसे “दिखावटी” या “शाम” लेन-देन बताने के दावे खारिज कर दिए गए थे।

न्यायमूर्ति बिंदल की अगुवाई वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा कि तकनीकी हस्तक्षेप संपत्ति लेन-देन की पवित्रता बनाए रखने और उन विवादों को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है, जो “न्यायिक प्रणाली को जाम कर रहे हैं”।

फैसले में कहा गया, “मामले से विदा लेने से पहले यह न्यायालय केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुझाव देना आवश्यक समझता है कि पंजीकृत दस्तावेज़ों और भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण की तत्काल आवश्यकता है, जिसमें ब्लॉकचेन जैसी सुरक्षित और छेड़छाड़-रोधी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाए।”

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ब्लॉकचेन एक साझा डिजिटल लेजर के रूप में काम करता है, जिससे किसी लेन-देन के दर्ज होते ही वह अपरिवर्तनीय और सुरक्षित हो जाता है।

फैसले में कहा गया, “कई विशेषज्ञों का मानना है कि ब्लॉकचेन, जो एक साझा डिजिटल रिकॉर्ड बुक (लेजर) प्रणाली है, यह सुनिश्चित कर सकता है कि बिक्री, बंधक या इसी तरह के किसी भी लेन-देन के दर्ज होते ही वह अपरिवर्तनीय और क्रिप्टोग्राफ़िक रूप से सुरक्षित हो जाए।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जालसाजी, गढ़े हुए दावों और ‘चतुर ड्राफ्टिंग’ के जरिए स्थापित संपत्ति अधिकारों को अस्थिर करने की प्रवृत्ति से निपटने के लिए ऐसे सुधार बेहद जरूरी हैं। अदालत ने कहा, “इस तरह के सुधार जालसाजी और ‘क्लेवेर ड्राफ्टिंग’ की समस्या को कम करने के लिए आवश्यक हैं, जो हमारी न्यायिक व्यवस्था को बोझिल बनाती है।”

पीठ ने व्यापक प्रशासनिक प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि भूमि अभिलेखों में निश्चितता से जनता का भरोसा बढ़ता है। “आधुनिक अर्थव्यवस्था में कारोबार में सुगमता सुनिश्चित करने और संपत्ति अधिकारों की पवित्रता बनाए रखने के लिए पंजीकृत दस्तावेज़ों में पूर्ण विश्वास होना चाहिए,” अदालत ने कहा।

करीब पांच दशक पुराने 1971 के एक पंजीकृत बिक्री विलेख से जुड़े विवाद का अंत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 2010 के फैसले को रद्द कर दिया और प्रथम अपीलीय अदालत के उस निर्णय को बहाल कर दिया, जिसमें बिक्री विलेख को नाममात्र और दिखावटी घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई थी।

 

With inputs from IANS