चीनी वैज्ञानिकों ने इबोला वायरस के एक अहम उत्परिवर्तन की पहचान कीBy Admin Tue, 27 January 2026 06:19 AM

बीजिंग। चीनी वैज्ञानिकों ने इबोला वायरस में एक महत्वपूर्ण उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) की पहचान की है, जिसने एक बड़े प्रकोप के दौरान वायरस की संक्रामक क्षमता को काफी बढ़ा दिया था। यह खोज महामारी निगरानी और दवा विकास के लिए नई और अहम जानकारियां प्रदान करती है।

जर्नल सेल में प्रकाशित इस अध्ययन में 2018 से 2020 के बीच कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में फैले इबोला वायरस रोग (EVD) के प्रकोप का विश्लेषण किया गया। यह इबोला का इतिहास में दूसरा सबसे बड़ा प्रकोप था, जिसमें 3,000 से अधिक लोग संक्रमित हुए और 2,000 से ज्यादा मौतें हुईं, शिन्हुआ समाचार एजेंसी ने बताया।

सन यात-सेन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कियान जून ने कहा, “यह शोध बताता है कि किसी भी बड़े उभरते संक्रामक रोग के दौरान रोगजनक की रियल-टाइम जीनोमिक निगरानी और उसके विकासात्मक विश्लेषण कितने महत्वपूर्ण होते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “इससे न केवल संक्रमण के जोखिम में बदलाव की समय रहते चेतावनी मिल सकती है, बल्कि मौजूदा दवाओं और टीकों की प्रभावशीलता का पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है, जिससे नियंत्रण रणनीतियों में पहले से जरूरी बदलाव किए जा सकें।”

शोध का मुख्य सवाल यह था कि स्थानीय स्वास्थ्य सुविधाओं की चुनौतियों के अलावा, क्या वायरस के विकास (एवोल्यूशन) ने भी इस इबोला प्रकोप के लंबे समय तक चलने में भूमिका निभाई।

प्रोफेसर जून ने बताया, “हम लंबे समय से जानते हैं कि प्रमुख वायरल उत्परिवर्तन अक्सर बड़े प्रकोपों के दौरान संक्रमण को तेज करने वाले अदृश्य कारक बन जाते हैं। इबोला पर एक दशक से अधिक समय तक काम करने के बाद हमारे लिए यह जांचना जरूरी था कि क्या इस वायरस में भी ऐसे ही उत्परिवर्तन मौजूद थे।”

वर्ष 2022 में टीम ने इबोला वायरस के 480 पूर्ण जीनोम का विश्लेषण किया और पाया कि वायरल ग्लाइकोप्रोटीन में एक विशेष उत्परिवर्तन वाला वेरिएंट, जिसे GP-V75A नाम दिया गया, DRC महामारी के शुरुआती चरण में ही उभर आया था।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह वेरिएंट तेजी से मूल स्ट्रेन की जगह लेने लगा और इसकी बढ़ती मौजूदगी संक्रमण के मामलों में आई तेजी से मेल खाती थी, जिससे संकेत मिला कि यह उत्परिवर्तन वायरस को फैलने में बढ़त देता है।

इसके बाद विभिन्न मॉडलों पर किए गए प्रयोगों से इस उत्परिवर्तन के जैविक प्रभाव की पुष्टि हुई। परिणामों से पता चला कि GP-V75A ने वायरस की विभिन्न प्रकार की होस्ट कोशिकाओं और चूहों को संक्रमित करने की क्षमता को काफी बढ़ा दिया।

अध्ययन में एक संभावित चिकित्सकीय चिंता भी सामने आई। GP-V75A उत्परिवर्तन के कारण कुछ मौजूदा उपचारात्मक एंटीबॉडी और छोटे अणु-आधारित एंट्री इनहिबिटर्स की प्रभावशीलता कम हो गई, जिससे दवा प्रतिरोध (ड्रग रेजिस्टेंस) का खतरा बढ़ सकता है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि ये निष्कर्ष इस बात पर जोर देते हैं कि किसी भी प्रकोप के दौरान वायरस के जीनोम की निरंतर निगरानी बेहद जरूरी है, ताकि उसके विकास से जुड़े खतरों का पहले से अनुमान लगाया जा सके और व्यापक प्रभाव वाले उपचार व रोकथाम उपाय विकसित किए जा सकें।

 

With inputs from IANS