
नई दिल्ली- बांग्लादेश में भारत विरोधी भावना भड़काने में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका अब स्पष्ट रूप से सामने आ रही है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान के कुछ समाचार माध्यमों और नेताओं के बयानों से यह पूरी तरह पुष्टि होती है कि आईएसआई जानबूझकर एक भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दे रही है, ताकि फरवरी में होने वाले चुनावों को प्रभावित किया जा सके।
कुछ पाकिस्तानी मीडिया संस्थानों ने छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के लिए भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) को जिम्मेदार ठहराने की गैर-जिम्मेदाराना कोशिश की है। यह आरोप ऐसे समय लगाए गए हैं, जब खुद बांग्लादेशी अधिकारी भी अभी हत्यारों और उनके मकसद को लेकर स्पष्ट नहीं हैं।
इस आग में घी डालने का काम पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी पीएमएल-एन के नेता कमरान सईद उस्मानी के एक भड़काऊ वीडियो संदेश ने किया है, जिसमें उन्होंने खुलकर भारत विरोधी बयानबाजी की। बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति के लिए नई दिल्ली को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने यहां तक धमकी दे डाली कि भारत की ओर मिसाइलें दागी जाएंगी। अधिकारियों के अनुसार, इस तरह के बयानों का एकमात्र उद्देश्य बांग्लादेश में हिंसा को जारी रखना है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ऐसे बयानों का एक स्पष्ट पैटर्न है। इसका मकसद बांग्लादेश की आंतरिक समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाना है और भारत को इसमें घसीटकर भ्रम फैलाना है। पाकिस्तान के अलावा किसी भी देश ने बांग्लादेश में जारी हालात के लिए भारत को दोषी नहीं ठहराया है। वास्तव में, खुफिया एजेंसियों का कहना है कि इस पूरे संकट की पटकथा पाकिस्तानी डीप-स्टेट ने लिखी, जिसने पहले शेख हसीना को सत्ता से बाहर कराया और फिर जमात-ए-इस्लामी को आगे बढ़ाया। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात से भली-भांति अवगत है कि जमात-ए-इस्लामी आईएसआई की कठपुतली है।
खुफिया सूत्रों के अनुसार, मुक्ति संग्राम के बाद भी आईएसआई और जमात ने मिलकर भारत में बड़े पैमाने पर अवैध घुसपैठ की योजना बनाई थी, ताकि जनसांख्यिकीय बदलाव किए जा सकें। इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी, जो बांग्लादेश के घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए हैं, कहते हैं कि आईएसआई यहां दोहरी रणनीति पर काम कर रही है।
1971 के युद्ध में हार और बांग्लादेश के निर्माण के बाद से ही पाकिस्तान भारत से बदला लेने की भावना में काम कर रहा है। इसी कारण एक झूठा नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, ताकि बांग्लादेश की जनता को भारत के खिलाफ खड़ा किया जा सके।
आईएसआई यह भी समझती है कि सत्ता में बने रहने के लिए उसे जमात-समर्थित या जमात की अगुवाई वाली सरकार की जरूरत होगी। हालांकि, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) अब जमात और आईएसआई से दूरी बनाती दिख रही है, क्योंकि पार्टी एक विकसित और गैर-उग्र राष्ट्र की छवि बनाना चाहती है।
यह संकेत तब और स्पष्ट हुए, जब बीएनपी ने जमात से किनारा कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस बदलाव से आईएसआई असहज हो गई है, क्योंकि मौजूदा हालात में बीएनपी के चुनाव जीतने की प्रबल संभावना है। जनमत सर्वेक्षणों में भी अवामी लीग के चुनाव से प्रतिबंधित होने के बाद बीएनपी की जीत का अनुमान लगाया जा रहा है।
पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया की खराब तबीयत भी पार्टी के लिए सहानुभूति का कारण बन सकती है। इसके अलावा, 17 वर्षों के निर्वासन के बाद उनके बेटे तारिक रहमान की बांग्लादेश वापसी से भी पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह देखने को मिल सकता है।
इन तमाम कारणों से आईएसआई और जमात दोनों ही बेचैन हैं और उन्हें आशंका है कि चुनाव उनके हाथ से निकल सकते हैं। बांग्लादेश मामलों के जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव के चलते चुनाव टलने की संभावना कम है, हालांकि उनकी निष्पक्षता पर सवाल जरूर बने हुए हैं।
खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, जमात-नियंत्रित समूह जानबूझकर हिंसा भड़का रहे हैं, ताकि लोग डर के मारे मतदान के लिए घरों से बाहर न निकलें। उनका उद्देश्य मतदान प्रतिशत को कम करना है।
अवामी लीग के समर्थकों के बड़ी संख्या में मतदान न करने की संभावना है, क्योंकि पार्टी पर प्रतिबंध है। हालांकि, इनमें से कुछ समर्थक बीएनपी की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे बीएनपी की जीत की संभावनाएं और मजबूत हो जाएंगी।
विश्लेषकों का मानना है कि या तो चुनावों में थोड़ी देरी हो सकती है या फिर वे पूरी तरह से निष्पक्ष न होकर संपन्न कराए जा सकते हैं। खुफिया एजेंसियों का कहना है कि आईएसआई हिंसा भड़काकर चुनावों में धांधली करने की हर संभव कोशिश कर रही है और इसके साथ-साथ बांग्लादेश में भारत विरोधी माहौल बनाने के लिए झूठा प्रचार भी कर रही है।
With inputs from IANS