
वॉशिंगटन। चीन और पाकिस्तान के बीच गहरी सैन्य साझेदारी भारत के सुरक्षा माहौल को प्रभावित कर रही है, भले ही बीजिंग नई दिल्ली के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव कम करने की कोशिश कर रहा हो। यह बात अमेरिका के रक्षा विभाग की कांग्रेस को सौंपी गई नई रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन और पाकिस्तान रक्षा सहयोग, हथियारों की बिक्री और सैन्य सहभागिता को लगातार विस्तार दे रहे हैं। इसमें पाकिस्तान को चीन का सबसे भरोसेमंद और संचालन के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण सैन्य साझेदार बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन-पाकिस्तान संबंधों में हथियार प्रणालियों का हस्तांतरण और सह-उत्पादन शामिल है, जो वायु, थल और नौसेना—तीनों क्षेत्रों तक फैला हुआ है। पाकिस्तानी सेना के आधुनिकीकरण में चीनी सैन्य उपकरणों की बड़ी भूमिका है।
आकलन के मुताबिक, चीन अपनी विदेश नीति के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए सैन्य साझेदारियों का इस्तेमाल करता है। हथियारों की बिक्री, प्रशिक्षण कार्यक्रम और संयुक्त गतिविधियां इसके प्रमुख साधन हैं, जिनका दीर्घकालिक लाभ पाकिस्तान को मिलता रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन-पाकिस्तान संबंध भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। संकट की स्थिति में भारत पर उत्तर और पश्चिम—दोनों मोर्चों से दबाव बनने की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि रिपोर्ट किसी संयुक्त सैन्य कार्रवाई की भविष्यवाणी नहीं करती, लेकिन दोनों देशों के रणनीतिक हितों में बढ़ते तालमेल की ओर जरूर इशारा करती है।
इसी बीच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चीन ने भारत के साथ सीमा पर स्थिति स्थिर रखने के लिए सीमित कदम उठाए हैं। अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के नेताओं ने एलएसी पर शेष गतिरोध वाले स्थानों से सैनिकों के पीछे हटने की घोषणा की थी। इसके बाद सीमा प्रबंधन को लेकर उच्चस्तरीय वार्ताएं भी नियमित रूप से होती रही हैं।
इसके बावजूद रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच अविश्वास अब भी गहरा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “लगातार बना आपसी अविश्वास और अन्य मुद्दे द्विपक्षीय संबंधों को सीमित करते रहेंगे।” इसमें यह भी जोड़ा गया कि चीन शांत सीमाएं इसलिए भी चाहता है ताकि भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक नजदीकियां न बढ़ें।
पेंटागन की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि चीन के क्षेत्रीय “दावों” में अरुणाचल प्रदेश शामिल है, जिसे बीजिंग अपने “मुख्य हितों” से जोड़ता है। इससे भारत-चीन सीमा विवाद और अधिक संवेदनशील बन जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन का व्यापक सैन्य विस्तार भी भारत की चिंताओं को बढ़ाता है। बीजिंग मिसाइल, साइबर, अंतरिक्ष और परमाणु क्षमताओं का तेजी से विस्तार कर रहा है, जिसका असर एशिया—खासतौर पर दक्षिण एशिया—में शक्ति संतुलन पर पड़ रहा है।
पाकिस्तान के लिए चीनी समर्थन रणनीतिक गहराई के साथ-साथ मौजूदा आर्थिक चुनौतियों के दौर में कूटनीतिक सहारा भी प्रदान करता है। वहीं भारत के लिए यह साझेदारी रणनीतिक घेरेबंदी की आशंकाओं को और मजबूत करती है।
रिपोर्ट में हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की रुचि का भी जिक्र किया गया है, जहां वह पहुंच और लॉजिस्टिक सुविधाओं की संभावनाएं तलाश रहा है। इनमें से कुछ क्षेत्र पाकिस्तान के समुद्री मार्गों के करीब हैं। हालांकि किसी स्थायी चीनी सैन्य अड्डे की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार ऐसी सुविधाएं भविष्य में पीएलए (चीनी सेना) के अभियानों में सहायक हो सकती हैं।
यह स्थिति भारत की समुद्री सुरक्षा योजना को और जटिल बना सकती है और जमीनी सीमाओं के अलावा अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।
कुल मिलाकर रिपोर्ट ने दक्षिण एशिया को एक आपस में जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र बताया है, जहां चीन के पाकिस्तान के साथ रिश्ते, भारत के साथ सतर्क संवाद और उसकी बढ़ती सैन्य शक्ति एक-दूसरे से टकराती हैं।
नई दिल्ली के लिए यह आकलन सतर्क रहने की जरूरत को रेखांकित करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को सीमा तनावों का प्रबंधन करने के साथ-साथ व्यापक क्षेत्रीय चुनौतियों के लिए भी तैयार रहना होगा। कूटनीतिक संवाद सुरक्षा रणनीति के साथ-साथ जारी रहेगा।
यह दस्तावेज चीन की सैन्य और सुरक्षा गतिविधियों पर अमेरिकी कांग्रेस को सौंपी जाने वाली वार्षिक समीक्षा का हिस्सा है और दक्षिण एशिया में बीजिंग के बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिका की चिंताओं को दर्शाता है।
With inputs from IANS