ताइवान के पास चीन के सैन्य अभ्यास पर अमेरिका ने जताई चिंता, संयम बरतने की अपीलBy Admin Fri, 02 January 2026 06:30 AM

वॉशिंगटन- अमेरिका ने ताइवान के आसपास चीन द्वारा किए गए अब तक के सबसे बड़े सैन्य अभ्यासों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि बीजिंग की कार्रवाइयां और बयानबाजी क्षेत्र में अनावश्यक रूप से तनाव बढ़ा रही हैं और ताइवान जलडमरूमध्य में स्थिरता को खतरे में डाल रही हैं।

इन सैन्य अभ्यासों से जुड़ी खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी विदेश विभाग के प्रिंसिपल डिप्टी प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा कि चीन को सैन्य दबाव से पीछे हटना चाहिए और बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए।

1 जनवरी को जारी बयान में पिगॉट ने कहा, “ताइवान और क्षेत्र के अन्य देशों के प्रति चीन की सैन्य गतिविधियां और बयानबाजी अनावश्यक रूप से तनाव बढ़ा रही हैं। हम बीजिंग से संयम बरतने, ताइवान के खिलाफ सैन्य दबाव समाप्त करने और इसके बजाय सार्थक संवाद में शामिल होने का आग्रह करते हैं।”

यह बयान ऐसे समय आया है, जब चीन ने 29 से 31 दिसंबर के बीच ‘जस्टिस मिशन 2025’ नामक बड़े पैमाने का सैन्य अभ्यास पूरा किया। इस अभ्यास में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की थलसेना, नौसेना, वायुसेना और रॉकेट फोर्स ने संयुक्त रूप से हिस्सा लिया। अभ्यास के दौरान ताइवान के चारों ओर घेराबंदी जैसी स्थिति का अभ्यास किया गया, जिसमें प्रमुख बंदरगाहों को सील करना, सटीक हमले करना और आपूर्ति मार्गों को बाधित करने जैसे परिदृश्य शामिल थे।

ताइवान के अधिकारियों के अनुसार, अभ्यास अवधि के दौरान 77 चीनी सैन्य विमान और 17 नौसैनिक जहाजों की गतिविधियां दर्ज की गईं। इसके जवाब में ताइवान ने लड़ाकू विमानों को उड़ान पर भेजा और अपनी रक्षा तैयारियों के तहत नदी मुखों पर विस्फोटक बैरल जैसे अवरोधक तैनात किए।

इन अभ्यासों के पैमाने और समय को लेकर अमेरिका के कई सहयोगी देशों ने भी चिंता जताई है। यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और ऑस्ट्रेलिया की सरकारों और संस्थानों ने ताइवान जलडमरूमध्य में बढ़ते सैन्य दबाव पर असहजता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि इस तरह की गतिविधियां गलत आकलन के जोखिम को बढ़ाती हैं।

बीजिंग ने इन अभ्यासों को कथित अलगाववादी ताकतों के लिए चेतावनी बताया और इन्हें अमेरिका-ताइवान रक्षा संबंधों में हालिया प्रगति से जोड़ा। इसमें ताइपे को 11.1 अरब डॉलर की अमेरिकी हथियार बिक्री का भी उल्लेख किया गया। चीनी अधिकारियों का कहना है कि ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियां बाहरी हस्तक्षेप के जवाब में की जा रही हैं।

अमेरिका के रुख को दोहराते हुए पिगॉट ने कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता का समर्थन करता है और यथास्थिति में किसी भी एकतरफा बदलाव का विरोध करता है, चाहे वह बल या दबाव के माध्यम से ही क्यों न हो।”

अमेरिकी अधिकारियों का लगातार कहना रहा है कि ताइवान जलडमरूमध्य की स्थिरता वैश्विक दृष्टि से बेहद अहम है, क्योंकि इसका सीधा संबंध अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। अब तक के सबसे बड़े बताए जा रहे इन अभ्यासों ने ताइवान के प्रति चीन की सैन्य रणनीति पर वैश्विक निगरानी और बढ़ा दी है।

इस बीच, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नए साल के संबोधन में ताइवान के साथ पुनर्एकीकरण के लक्ष्य को दोहराया। यह संदेश ऐसे समय दिया गया जब सैन्य अभ्यास समाप्त हो रहे थे। ताइवान की सरकार ने बीजिंग के संप्रभुता दावों को खारिज करते हुए कहा है कि द्वीप का भविष्य केवल वहां के लोगों द्वारा ही तय किया जा सकता है।

ताइवान वर्ष 1949 से मुख्यभूमि चीन से अलग प्रशासन के तहत रहा है और उसने अपनी अलग लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था, सेना और अर्थव्यवस्था विकसित की है। चीन ताइवान को अपना अलग हुआ प्रांत मानता है और बार-बार उसे मुख्यभूमि के साथ एकीकृत करने के लक्ष्य को दोहराता रहा है।

हाल ही में अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) की एक स्वतंत्र रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की सैन्य गतिविधियों से जुड़ा तनाव केवल ताइवान जलडमरूमध्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विवादित समुद्री क्षेत्रों में दबाव और जबरदस्ती की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि क्षेत्रीय विवादों का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत और बिना किसी दबाव या बल प्रयोग के किया जाना चाहिए, साथ ही नौवहन और हवाई उड़ानों की स्वतंत्रता बनाए रखी जानी चाहिए।

सीआरएस रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि अमेरिका, भले ही पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को चीन की एकमात्र वैध सरकार के रूप में मान्यता देता है, लेकिन उसकी दीर्घकालिक नीतियां ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता का समर्थन करती हैं और बल प्रयोग के जरिए मौजूदा व्यवस्था को बदलने का विरोध करती हैं। दशकों से यही नीतियां क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका का मार्गदर्शन करती रही हैं और बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच आज भी वाशिंगटन के दृष्टिकोण का केंद्र बनी हुई हैं।

 

With inputs from IANS