
वॉशिंगटन: अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि उसके सहयोगी देशों को वैश्विक रक्षा जिम्मेदारियों में अब अधिक हिस्सेदारी निभानी होगी। वर्ष 2026 की नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी के अनुसार, वॉशिंगटन अपनी सैन्य प्राथमिकताओं को देश की आंतरिक सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को रोकने पर केंद्रित कर रहा है।
रणनीति दस्तावेज में कहा गया है कि अमेरिका की गठबंधन व्यवस्था अब भी अहम है, लेकिन वह निर्भरता के आधार पर आगे नहीं चल सकती। इसमें कहा गया, “हमारे सहयोगी यह हमारे लिए किसी उपकार के रूप में नहीं, बल्कि अपने हितों के तहत करेंगे।” दस्तावेज में इस बात पर जोर दिया गया है कि सहयोगी देशों को अब “पिछली पीढ़ी की निर्भरता” के बजाय सक्रिय योगदानकर्ता बनना होगा।
रणनीति के अनुसार, अमेरिका जब आंतरिक सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र को प्राथमिकता दे रहा है, तब भी अन्य क्षेत्रों में खतरे बने रहेंगे। ऐसे में सहयोगी देशों की भागीदारी बेहद जरूरी होगी। दस्तावेज में कहा गया है कि सहयोगियों को उन सुरक्षा चुनौतियों का नेतृत्व करना चाहिए, जो अमेरिका के लिए कम लेकिन उनके लिए अधिक गंभीर हैं, जबकि अमेरिका सीमित लेकिन महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करेगा।
रणनीति में एक प्रमुख चिंता के रूप में “समानांतरता की समस्या” (सिमल्टेनिटी प्रॉब्लम) का उल्लेख किया गया है, यानी यह जोखिम कि कई विरोधी एक साथ या अलग-अलग मोर्चों पर अवसरवादी कार्रवाई कर सकते हैं। इसमें कहा गया है कि सहयोगी देशों द्वारा दशकों तक अपनी रक्षा पर अपर्याप्त निवेश के कारण यह जोखिम बढ़ा है, जिससे अमेरिका को सुरक्षा पर अधिक खर्च करना पड़ा, जबकि अन्य देश घरेलू प्राथमिकताओं पर ध्यान देते रहे।
दस्तावेज में कहा गया, “लंबे समय तक सहयोगी और साझेदार इस बात से संतुष्ट रहे कि हम उनकी रक्षा का खर्च उठाते रहें।” इसमें जोड़ा गया कि आम अमेरिकी नागरिकों ने इसकी कीमत चुकाई, जबकि राजनीतिक नेतृत्व ने श्रेय लिया। रणनीति के अनुसार, अब यह दौर खत्म हो चुका है और बोझ साझा करना नई रणनीति का “अनिवार्य तत्व” है।
रणनीति में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में तय किए गए एक नए वैश्विक रक्षा खर्च मानक का भी उल्लेख है। इसके तहत सहयोगी देशों से अपेक्षा की गई है कि वे अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.5 प्रतिशत मुख्य सैन्य क्षमताओं पर और अतिरिक्त 1.5 प्रतिशत सुरक्षा से जुड़े खर्च पर करें, यानी कुल 5 प्रतिशत जीडीपी। दस्तावेज में कहा गया है कि यह मानक केवल यूरोप तक सीमित नहीं, बल्कि दुनिया भर में लागू होना चाहिए।
यूरोप के संदर्भ में रणनीति में कहा गया है कि नाटो सहयोगी अपनी संयुक्त आर्थिक ताकत और औद्योगिक क्षमता के बल पर पारंपरिक रक्षा की मुख्य जिम्मेदारी उठाने की स्थिति में हैं। इसमें कहा गया है कि यूरोपीय देशों को अपने लिए अधिक गंभीर खतरों का नेतृत्व स्वयं करना होगा, जिसमें यूक्रेन की रक्षा में सहायता की जिम्मेदारी भी शामिल है, जबकि अमेरिका अपनी सैन्य तैनाती को उसी अनुसार संतुलित करेगा।
दस्तावेज में कहा गया, “यूरोप के सामने मौजूद सुरक्षा खतरों का समाधान यही है कि वह अपनी पारंपरिक रक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी खुद संभाले।” साथ ही यह भी जोड़ा गया कि अमेरिका की भागीदारी जारी रहेगी, लेकिन उसका फोकस अन्य प्राथमिकताओं पर अधिक होगा।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीति इस बात पर जोर देती है कि सहयोगी और साझेदार “स्वतंत्र और खुली क्षेत्रीय व्यवस्था” में साझा हित रखते हैं और चीन को संतुलित करने व रोकने में उनकी भूमिका अहम है। दस्तावेज के अनुसार, उनकी भागीदारी क्षेत्र में प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने और शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
रणनीति यूरोप और एशिया से परे भी बोझ साझा करने की अपेक्षाओं को रेखांकित करती है। मध्य पूर्व में क्षेत्रीय साझेदारों से ईरान और उसके सहयोगी गुटों को रोकने में अधिक जिम्मेदारी निभाने की बात कही गई है, जबकि अमेरिका का समर्थन सीमित लेकिन निर्णायक रहेगा। कोरियाई प्रायद्वीप पर रणनीति में कहा गया है कि दक्षिण कोरिया उत्तर कोरिया को रोकने की प्राथमिक जिम्मेदारी संभालने में सक्षम है, जिसमें अमेरिकी बल सीमित भूमिका निभाएंगे।
दस्तावेज के अनुसार, उन “आदर्श सहयोगियों” को प्रोत्साहन दिया जाएगा जो रक्षा खर्च प्रतिबद्धताओं को पूरा करते हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा में स्पष्ट योगदान देते हैं। सहयोग को हथियारों की बिक्री, रक्षा औद्योगिक सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करने और परिचालन योजना के माध्यम से प्राथमिकता दी जाएगी।
रणनीति का तर्क है कि प्रभावी बोझ साझा करने से वैश्विक स्तर पर प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और सहयोगी नेटवर्क एक साथ कई संकटों की स्थिति में भी पर्याप्त सैन्य शक्ति जुटा सकते हैं।
With inputs from IANS