चीन के बैंकों से लिए गए कर्ज ने जाम्बिया को आर्थिक संकट में धकेला: रिपोर्टBy IANS Sat, 31 October 2026 04:16 PM

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अफ्रीकी देश जाम्बिया में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए चीन के बड़े बैंकों से लिया गया कर्ज अंततः देश के गंभीर आर्थिक संकट की वजह बन गया। एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन के सरकारी नियंत्रण वाले प्रमुख बैंकों ने जाम्बिया पर बढ़ते कर्ज के बोझ के बावजूद उसे लगातार ऋण दिया। वहीं, चीन की निर्माण कंपनियों ने भी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए जाम्बिया की सरकारी संस्थाओं को नए कर्ज लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

एशिया टाइम्स ने इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (ICIJ) की एक जांच का हवाला देते हुए यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, जाम्बिया की सरकार सड़कों, हवाई अड्डों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए आसानी से उपलब्ध वित्तपोषण की तलाश में चीनी बैंकों से बड़े पैमाने पर कर्ज लेती रही। हालांकि, इसी दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तांबे की कीमतों में गिरावट आई। तांबा जाम्बिया की अर्थव्यवस्था और निर्यात आय का प्रमुख स्रोत है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि लगातार बढ़ते कर्ज ने देश की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भी बढ़ते विदेशी कर्ज और राजकोषीय घाटे को लेकर चेतावनी दी थी। आखिरकार जाम्बिया ऐसी स्थिति में पहुंच गया, जहां उसके लिए कर्ज की अदायगी करना मुश्किल हो गया। इसके बाद देश को कई वर्षों तक धीमी आर्थिक सुधार प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।

इस आर्थिक संकट का असर आम लोगों के जीवन पर भी पड़ा। रिपोर्ट में राजधानी लुसाका की एक किसान महिला का उदाहरण दिया गया है, जिसने अक्टूबर 2025 में बिजली संकट के कारण अपनी जैविक सब्जियों की पूरी फसल उखाड़कर सूअरों को खिला दी। बिजली कटौती के चलते फसलों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा था।

किसान ने बताया, "हम कुछ नहीं कर सकते थे। बिजली नहीं होने के कारण फसलों के लिए पानी उपलब्ध नहीं था।"

जाम्बिया में बिजली की कमी के कारण बड़े पैमाने पर निर्धारित बिजली कटौती यानी लोड शेडिंग लागू की गई थी। देश की लगभग पूरी बिजली आपूर्ति संभालने वाली सरकारी कंपनी जेस्को (ZESCO) ने उपभोक्ताओं के लिए बिजली कटौती का समय जारी किया था। हालांकि, किसान के मुताबिक, घोषित कार्यक्रम भरोसेमंद नहीं था और बिजली आपूर्ति की स्थिति लगातार बदलती रहती थी।

रिपोर्ट में चीन के प्रमुख सरकारी बैंक आईसीबीसी (ICBC) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि चीनी वित्तीय संस्थानों ने ऐसे देश को भी जोखिम भरे और कठिन शर्तों वाले कर्ज दिए, जिसकी उन्हें चुकाने की क्षमता पर सवाल उठ रहे थे। दूसरी ओर, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के ठेके हासिल करने की इच्छुक चीनी कंपनियां जाम्बिया की सरकारी संस्थाओं को इन परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए और कर्ज लेने के लिए प्रेरित कर रही थीं।

रिपोर्ट ने चीन की वित्तपोषित कई परियोजनाओं की आर्थिक उपयोगिता पर भी सवाल उठाए हैं। इसमें कहा गया है कि कुछ परियोजनाओं के ठेके प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के बिना दिए गए, उनकी लागत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई और उनसे मिलने वाला आर्थिक लाभ सीमित रहा।

जाम्बिया में चीन की भूमिका को लेकर आम लोगों की राय में भी बदलाव आया है। एशिया टाइम्स की रिपोर्ट में अफ्रोबैरोमीटर के सर्वेक्षण आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि जाम्बिया में चीन के आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को सकारात्मक नजरिए से देखने वाले लोगों का अनुपात 2014 में 72 प्रतिशत था, जो 2022 में घटकर 42 प्रतिशत रह गया।

रिपोर्ट के निष्कर्ष चीन की ऋण आधारित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की रणनीति और विकासशील देशों की कर्ज चुकाने की क्षमता के बीच संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। जाम्बिया का अनुभव यह भी रेखांकित करता है कि बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश और कर्ज से शुरू की गई विकास परियोजनाओं की सफलता के लिए उनकी वास्तविक आर्थिक उपयोगिता और दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता का आकलन जरूरी है।