
RANCHI : झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा JTET में भाषा को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए गठित पाँच मंत्रियों की विशेष कमिटी की पहली बैठक बिना किसी नतीजा पर पहुंचे सोमवार को सम्पन्न हुई। बैठक मे विशेष कमिटी के सभी सदस्यों ने अपने-अपने हिसाब से क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर तथ्यों के साथ अपने तर्क को रखा, लेकिन इसपर कोई ठोस नतीजा नहीं निकाल पाया। बैठक से पहले विशेष कमिटी के समव्यक वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कार्मिक विभाग से आवश्यक जानकारियाँ मांगी थी, लेकिन विभाग की तरफ से संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। इसके बाद कमिटी ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अगली बैठक से पहले पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराई जाए। बैठक में जेटेट नियमावली से भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषाओं को बाहर किए जाने के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई. समिति के सदस्यों ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों से पूछा कि आखिर किन आधारों पर इन भाषाओं को नियमावली से हटाया गया. समिति ने विभाग से संबंधित सभी तथ्यात्मक और प्रशासनिक डाटा उपलब्ध कराने को कहा है, ताकि निर्णय के पीछे की प्रक्रिया और आधार स्पष्ट हो सके.
भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वालों की संख्या का मांगा गया डाटा
इसके अलावा समिति ने यह भी जानकारी मांगी कि राज्य के विभिन्न जिलों में भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वाले लोगों की संख्या कितनी है. साथ ही पूर्व में आयोजित जेटेट परीक्षाओं में इन भाषाओं के माध्यम से कितने अभ्यर्थी शामिल हुए थे, इसका भी विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने को कहा गया है. समिति का मानना है कि किसी भी भाषा को नियमावली में शामिल या बाहर करने से पहले उससे जुड़े सामाजिक, शैक्षणिक और जनसंख्या संबंधी आंकड़ों का अध्ययन आवश्यक है.
जनगणना के आँकड़े पर उठे सवाल
बैठक मे कार्मिक विभाग द्वारा प्रस्तुत आँकड़े पर भी सवाल खड़े किए गए। मिली जानकारी के अनुसार 2011 की जनगणना के आधार पर भोजपुरी और मगही बोलनेवालों की संख्या मांगी गई थी। जो आँकड़े सामने आये उसमें इन भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या उडिया और बांग्ला भक्षियों से चार गुना अधिक है। ऐसे में सदस्यों ने सवाल उठाया कि जब इन भाषाओं का दायरा इतना व्यापक है तो इन्हें परीक्षा से बाहर क्यों किया गया। वहीं, नई नियमावली मे कुरमाली भाषा को संथाल परगना के की जिलों मे नहीं शामिल करने पर भी आपत्ति जताई गई। जबकि वहाँ इसे बोलनेवालों की संख्या तीन लाख से अधिक है।
मैथिली भाषा पर भी हुई चर्चा
बैठक मे मैथिली भाषा पर भी चर्चा हुई। कहा गया कि जब मैथिली राज्य की दूसरी राजभाषा है तो इसे क्यों नहीं क्षेत्रीय भाषा मे शामिल किया गया है। कमिटी ने सुझाव दिया कि मैथिली जिसे राज्य मे दूसरी राजभाषा का दर्ज प्राप्त है उसे भी क्षेत्रीय भाषा मे शामिल किया जाए।
असुर और बिरहोर को लेकर भी हुई चर्चा
बैठक में आदिम जनजातीय भाषाओं का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा. विशेष रूप से असुर और बिरहोर जैसी आदिम जनजातियों की भाषाओं को नियमावली से हटाने के आधार पर सवाल उठाए गए. समिति के सदस्यों ने कहा कि इन भाषाओं का संबंध राज्य की सांस्कृतिक और जनजातीय पहचान से जुड़ा हुआ है, इसलिए इनके संबंध में संवेदनशीलता और व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है.
22 मई को होगी कमिटी की अगली बैठक
समिति ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि राज्य के किस जिले और क्षेत्र में कौन-कौन सी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं बोली जाती हैं, उसका विस्तृत आंकड़ा तैयार किया जाए. साथ ही संबंधित भाषाओं के उपयोग, बोलने वालों की संख्या और शैक्षणिक आवश्यकता का भी संपूर्ण विवरण अगली बैठक में प्रस्तुत करने को कहा गया है. बैठक के अंत में तय किया गया कि समिति की अगली बैठक 22 मई शुक्रवार को आयोजित होगी, जिसमें शिक्षा विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों और रिपोर्ट के आधार पर आगे की चर्चा की जाएगी. माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया के बाद भाषा विवाद के समाधान की दिशा में कोई ठोस निर्णय सामने आ सकता है. बैठक में मंत्री राधाकृष्णा किशोर, दीपिका पांडे सिंह, योगेंद्र प्रसाद, सुदिव्य कुमार सोनू तथा संजय प्रसाद यादव समेत समिति के अन्य सदस्य भी उपस्थित रहे.