वायु प्रदूषण से घट रही जीवन प्रत्याशा, उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता: विशेषज्ञBy Admin Thu, 18 December 2025 10:51 AM









नई दिल्ली। वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह लगातार जीवन प्रत्याशा को कम कर रहा है, उत्पादकता घटा रहा है और लोगों के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने गुरुवार को यह बात कही। राष्ट्रीय राजधानी में पिछले एक महीने से अधिक समय से वायु गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है।

दिल्ली और एनसीआर के विभिन्न हिस्सों से आए दृश्यों में घना स्मॉग सड़कों, आवासीय इलाकों और सार्वजनिक स्थलों पर छाया हुआ दिखाई दिया, जिससे दृश्यता में भारी कमी आई और लोगों की दैनिक आवाजाही प्रभावित हुई। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 356 दर्ज किया गया।

विशेषज्ञों ने बताया कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क में रहने से न केवल भारत की आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो रही है, बल्कि स्ट्रोक, हृदय रोग, श्वसन संबंधी बीमारियों और तंत्रिका विकारों जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में भी तेजी से वृद्धि हो रही है।

इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव पड़ रहा है, जो अंततः भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता को कमजोर कर रहा है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव राजेश भूषण ने कहा, “लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से केवल जीवन प्रत्याशा ही कम नहीं होती, बल्कि विकलांगता के साथ बिताए जाने वाले वर्षों की संख्या भी बढ़ जाती है। अत्यधिक प्रदूषित शहरों में लोग अधिक समय तक जीवित रह सकते हैं, लेकिन पुरानी बीमारियों के साथ, जिससे उनकी उत्पादकता, जीवन की गुणवत्ता और आर्थिक योगदान प्रभावित होता है।”

उन्होंने इलनेस टू वेलनेस फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में आगे कहा, “वायु प्रदूषण से निपटने के लिए स्वास्थ्य प्रणालियों, शहरी नियोजन और जन-जागरूकता के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है, जिसमें निवारक और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर कहीं अधिक जोर दिया जाना चाहिए।”

दिल्ली के प्रसिद्ध पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. जी. सी. खिलनानी ने वायु प्रदूषण को “मानव-निर्मित सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल” बताते हुए कहा कि इसका श्वसन और हृदय स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव पड़ने की आशंका है।

उन्होंने कहा, “वायु प्रदूषण के सबसे खतरनाक प्रभाव अक्सर दिखाई नहीं देते। अति-सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं, रक्त प्रवाह में शामिल हो जाते हैं और बिना किसी शुरुआती चेतावनी के कई अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं।”

न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दलजीत सिंह ने कहा कि प्रदूषण मस्तिष्क में रक्त संचार को प्रभावित करता है और इस्केमिक तथा हेमरेजिक दोनों प्रकार के स्ट्रोक के खतरे को काफी बढ़ा देता है।

उन्होंने कहा, “अब हम उच्च प्रदूषण वाले महीनों में स्ट्रोक के मामलों में स्पष्ट मौसमी बढ़ोतरी देख रहे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रदूषण एक स्वतंत्र जोखिम कारक के रूप में उभर रहा है। स्ट्रोक के अलावा, वायु प्रदूषण का संबंध अल्जाइमर, डिमेंशिया और पार्किंसन जैसी तंत्रिका संबंधी बीमारियों से भी है, जिससे यह एक बढ़ती हुई न्यूरोलॉजिकल चुनौती बन गया है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।”

फिक्की हेल्थ सेक्टर के मेंटर डॉ. हर्ष महाजन ने कहा कि वायु प्रदूषण लगभग हर बीमारी को गंभीर बनाने वाला एक “मूक जोखिम कारक” बन चुका है।

उन्होंने कहा, “यह समस्या गरीबों, बच्चों और बाहर काम करने वाले श्रमिकों को असमान रूप से प्रभावित करती है, जबकि वे इस समस्या के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। खतरनाक मिथक यह है कि केवल तकनीक ही इस संकट का समाधान कर देगी। वास्तव में, हमारे पास सबसे ज्यादा कमी तात्कालिकता और जवाबदेही की है।”

विशेषज्ञों ने स्वस्थ जीवन और अधिक मजबूत अर्थव्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालिक प्रतिबद्धता, सख्त प्रवर्तन और जागरूक जनभागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया।

 

With inputs from IANS

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