भारतीय कार्यबल में बढ़ती पुरानी बीमारियाँ, मानसिक तनाव और बर्नआउट : रिपोर्टBy Admin Thu, 29 May 2025 07:40 AM









बेंगलुरु — भारत के कॉर्पोरेट जगत में एक चुपचाप फैलता स्वास्थ्य संकट सामने आ रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में कर्मचारी पुरानी बीमारियों, मानसिक अस्वस्थता और बर्नआउट (अत्यधिक कार्य थकावट) से जूझ रहे हैं। यह खुलासा गुरुवार को जारी एक चिंताजनक रिपोर्ट में हुआ।

यह रिपोर्ट भारत की अग्रणी कर्मचारी स्वास्थ्य लाभ मंच Plum द्वारा जारी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 40 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते कार्यरत पेशेवरों में पुरानी बीमारियों की शुरुआत हो जाती है। साथ ही, 40 प्रतिशत कर्मचारी मानसिक स्वास्थ्य कारणों से हर महीने कम से कम एक दिन की छुट्टी लेते हैं, जबकि हर पाँच में से एक कर्मचारी बर्नआउट की वजह से नौकरी छोड़ने पर विचार कर रहा है।

चौंकाने वाली बात यह है कि गंभीर बीमारियों की शुरुआत बहुत कम उम्र में हो रही है—हृदय रोग 32 वर्ष, कैंसर 33 वर्ष, मधुमेह 34 वर्ष, क्रोनिक किडनी डिजीज 35 वर्ष, और स्ट्रोक व इस्कीमिया जैसे सेरेब्रोवैस्कुलर रोग 36 वर्ष की उम्र तक सामने आने लगते हैं।

यह शुरुआती स्वास्थ्य संकट न केवल व्यक्तिगत जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि इससे कार्यस्थल की उत्पादकता, स्वास्थ्य खर्च और भारत की आर्थिक संभावनाओं पर भी दीर्घकालिक दबाव बन रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, पुरानी बीमारियाँ कंपनियों को प्रति कर्मचारी हर वर्ष औसतन 30 कार्यदिवस के उत्पादकता नुकसान और कार्य में अरुचि के रूप में नुकसान पहुंचाती हैं।

रिपोर्ट ने भारतीय कंपनियों से अपील की है कि वे कर्मचारी लाभों की परिभाषा को पुनः निर्धारित करें और रोकथाम, समग्र देखभाल और कार्यबल की विशिष्ट आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करें।

Plum के सह-संस्थापक अभिषेक पोद्दार ने कहा, “हमें कंपनियों को यह समझाने की आवश्यकता है कि स्वास्थ्य बीमा केवल लेन-देन का विषय नहीं है। असली कर्मचारी कल्याण तब संभव है जब मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्वास्थ्य को समग्र रूप से देखा जाए।”

उन्होंने आगे कहा, “यह रिपोर्ट बताती है कि हमें कर्मचारियों को उनकी स्वास्थ्य यात्रा में सशक्त बनाने की जरूरत है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य की विविध आवश्यकताओं को भी गंभीरता से संबोधित किया जाना चाहिए।”

रिपोर्ट के मुताबिक, बीमारियों के बोझ में लगातार वृद्धि के बावजूद, केवल 20 प्रतिशत कंपनियाँ ही नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधा देती हैं। और जब यह सुविधा उपलब्ध होती भी है, तो केवल 38 प्रतिशत कर्मचारी ही इसका लाभ उठाते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ भी तेजी से बढ़ रही हैं, जिनमें एंग्ज़ायटी (चिंता) सबसे प्रमुख चिंता का विषय बन चुकी है।

डेटा यह भी दर्शाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में लैंगिक असमानता मौजूद है। 30 से 49 वर्ष की आयु सीमा में पुरुषों का उपयोग 58 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं में यह अनुपात बहुत कम है। हालांकि, 50 से 59 वर्ष की आयु वर्ग में महिलाएं 68 प्रतिशत स्वास्थ्य लाभ उपयोग कर रही हैं। इसका कारण मेनोपॉज़ और पेरीमेनोपॉज़ की उम्र होना है। वर्षों तक परिवार की देखभाल में अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करने के कारण महिलाएं देर से इलाज करवाती हैं, जिससे स्थितियाँ अधिक गंभीर हो जाती हैं और तब जाकर वे उपचार की ओर अग्रसर होती हैं।

 

With inputs from IANS

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