अध्ययन में दावा: मोटापे के जोखिम वाले भारतीयों के लिए जीवनशैली आधारित समाधान अधिक असरदार हो सकते हैंBy Admin Wed, 23 July 2025 04:33 AM









हैदराबाद: एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि मोटापे के अनुवांशिक जोखिम वाले भारतीयों के लिए जीवनशैली में बदलाव या विशेष पोषक तत्वों की खुराक अधिक बेहतर परिणाम दे सकती है।

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के तहत संचालित सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB), हैदराबाद के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में यह पाया गया कि यूरोपीय मूल के लोगों में मोटापे से जुड़े जिन जीन वेरिएंट्स की पहचान की गई है, वे भारतीयों में समान प्रभाव नहीं डालते। यह भारतीयों में मोटापे के अलग तरह के स्वरूप को दर्शाता है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर (PRS) यूरोपीय वंश के लोगों में मोटापे की सटीक भविष्यवाणी करता है, लेकिन भारतीयों और अन्य वंशों में इसका सटीकता कम है।

डॉ. गिरिराज रतन चंदक के नेतृत्व में CCMB के शोधकर्ताओं ने भारतीय आबादी के जीनोम का विश्लेषण किया। इस विश्लेषण में उन लोगों को शामिल किया गया जो मधुमेह से पीड़ित हैं और वे भी जिनका रक्त शर्करा स्तर सामान्य है। इन लोगों को लगभग 20 वर्षों से फॉलो किया जा रहा है, जिससे भारतीयों में मोटापे के आनुवंशिक कारणों की जांच का अनूठा अवसर मिला।

भारत और दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में मोटापा एक गंभीर समस्या है, जो मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों जैसी बीमारियों से जुड़ा हुआ है। भारत में मोटापा मुख्य रूप से पेट के आसपास केंद्रित होता है, जो इसे यूरोप की तुलना में अलग बनाता है।

शोधकर्ताओं ने भारतीयों के लिए एक PRS विकसित किया, जिससे एक "आभासी व्यक्ति" के रूप में मोटापे के जोखिम को मॉडल किया गया। इस भारतीय डेटा को दक्षिण एशियाई आबादी के प्रतिनिधि के रूप में उपयोग किया गया, जिससे अध्ययन के निष्कर्ष इस क्षेत्र के लिए और अधिक प्रासंगिक बन गए।

वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि एक व्यक्ति के आनुवंशिक जोखिम और जीवनशैली आधारित वजन घटाने के उपायों — जैसे कि आहार और व्यायाम — के बीच क्या संबंध है। उन्होंने पाया कि जिन लोगों में मोटापे का अनुवांशिक जोखिम अधिक था, वे इन उपायों के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन जैसे ही ये उपाय बंद होते हैं, उनका वजन तेजी से वापस बढ़ने लगता है।

डॉ. चंदक ने कहा, “यह अध्ययन पहले किए गए ऊंचाई (height) पर शोध के अनुरूप है, जिसमें पाया गया था कि यूरोपीय जीन वेरिएंट भारतीयों में कम सटीकता से जोखिम का अनुमान लगाते हैं। इसमें पर्यावरण और जीवनशैली से जुड़ी जीन की भूमिका अधिक होती है। ऐसा लगता है कि भारतीयों में मोटापे के पूर्वानुमान में जीवनशैली, आहार और पोषण की भूमिका समान या उससे अधिक हो सकती है। इसलिए, भारतीयों के लिए आनुवंशिक जोखिम की पृष्ठभूमि में जीवनशैली आधारित समाधान या पोषक तत्वों की खुराक अधिक असरदार हो सकती है।”

डॉ. चंदक के पहले किए गए शोध से भी यह साबित होता है कि भारत और यूरोप के बीच गैर-संचारी रोगों के आनुवंशिक कारणों में बड़ा अंतर है।

यह नवीनतम अध्ययन एक वैश्विक परियोजना का हिस्सा है, जिसमें 500 संस्थानों के 600 से अधिक शोधकर्ता शामिल हैं। इसमें GIANT कंसोर्टियम और 23andMe जैसे डीएनए परीक्षण प्लेटफॉर्म से प्राप्त दुनिया की सबसे बड़ी और विविध आनुवंशिक डेटा का उपयोग किया गया। इस डेटा में 50 लाख से अधिक लोगों की आनुवंशिक जानकारी शामिल थी, जिनमें भारत के लोग भी थे।

इस डेटा का उपयोग करके शोधकर्ताओं ने एक जेनेटिक टेस्ट (PRS) तैयार किया, जो बचपन में ही यह अनुमान लगा सकता है कि कोई व्यक्ति वयस्क होने पर मोटापा विकसित कर सकता है या नहीं। यह स्कोर पहले के किसी भी टेस्ट की तुलना में मोटापे के जोखिम का अनुमान दोगुनी सटीकता से लगाता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के CBMR (NNF सेंटर फॉर बेसिक मेटाबॉलिक रिसर्च) के असिस्टेंट प्रोफेसर रोएलॉफ स्मिट, जो इस शोध के प्रमुख लेखक हैं, ने कहा, “यह स्कोर इतना प्रभावशाली इसलिए है क्योंकि यह पांच वर्ष की उम्र में ही यह अनुमान लगा सकता है कि कोई बच्चा वयस्क होने पर मोटापा विकसित करेगा या नहीं, जब कि उस उम्र में अन्य जोखिम कारक वजन को प्रभावित करना शुरू नहीं करते। इस स्तर पर हस्तक्षेप से भारी फर्क पड़ सकता है।”

 

With inputs from IANS

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