
लेह - देश में आइस हॉकी को लेकर एक नई क्रांति आकार ले रही है और इसमें भारतीय सेना की विशिष्ट पर्वतीय इन्फैंट्री रेजिमेंट लद्दाख स्काउट्स अग्रणी भूमिका निभा रही है। जब भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, तब आइस हॉकी के क्षेत्र में उनके सराहनीय योगदान को रेखांकित करने का इससे बेहतर अवसर नहीं हो सकता।
2026 खेलो इंडिया विंटर गेम्स (केआईडब्ल्यूजी) के छठे संस्करण का पहला चरण लेह (लद्दाख) में जारी है, जहां आइस हॉकी और आइस स्केटिंग के मुकाबले खेले जा रहे हैं। इन खेलों में एक बार फिर सेना और लद्दाख स्काउट्स के खिलाड़ी अपना दबदबा साबित कर रहे हैं। पुरुष वर्ग के फाइनल में सेना की टीम गणतंत्र दिवस के अवसर पर सोमवार को चौंकाने वाली एंट्री करने वाली चंडीगढ़ से भिड़ेगी।
हालांकि, बर्फीले मैदान पर जीत या स्वर्ण पदक से कहीं अधिक अहम वे प्रयास हैं जो लद्दाख स्काउट्स खेल के प्रचार-प्रसार के लिए रिंक के बाहर कर रहे हैं। उनका लक्ष्य आइस हॉकी को केवल बर्फीले और पर्वतीय इलाकों तक सीमित न रखते हुए देश के मैदानी और तटीय क्षेत्रों तक पहुंचाना है।
हालांकि कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन माना जाता है कि लद्दाख स्काउट्स ने 1970 के दशक के उत्तरार्ध में आइस हॉकी खेलना शुरू किया था। उस समय न तो उपयुक्त मैदान थे और न ही उपकरण—खेल सिर्फ मनोरंजन के लिए खेला जाता था।
1980 के दशक के अंत में उन्होंने इस खेल को गंभीरता से लेना शुरू किया। प्राकृतिक आइस रिंक बनाए गए और महंगे उपकरण आयात किए गए। गौरतलब है कि आज एक खिलाड़ी के लिए आइस हॉकी किट की कीमत लगभग चार लाख रुपये तक हो सकती है।
साल 2000 में जब लद्दाख स्काउट्स को पूर्ण इन्फैंट्री के रूप में पुनर्गठित किया गया, तब आइस हॉकी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और प्रयासों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
वर्तमान में भारत में ओलंपिक आकार के केवल दो कृत्रिम आइस रिंक हैं—एक देहरादून में और दूसरा लेह में, जो नवनिर्मित इनडोर नवांग दोरजे स्टोबदान स्टेडियम में स्थित है।
2026 केआईडब्ल्यूजी में खेल रही सेना की टीम के कप्तान पार्थ जगताप ने कहा, “आइस हॉकी को वास्तव में लोकप्रिय बनाने के लिए देशभर में और अधिक आइस रिंक की आवश्यकता है। फिलहाल यह खेल मुख्य रूप से लेह तक ही सीमित है। इसे देश के अन्य हिस्सों तक ले जाना ही इसके विकास का एकमात्र रास्ता है।”
मुंबई में पिछले वर्ष उत्कृष्ट खेल और शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए ‘डिस्टिंग्विश्ड अवॉर्ड’ से सम्मानित कप्तान जगताप ने खेलो इंडिया की भूमिका की भी सराहना की।
उन्होंने कहा, “खेलो इंडिया की भागीदारी से कई स्तरों पर मदद मिली है। मीडिया कवरेज के कारण आइस हॉकी को लेकर जागरूकता बढ़ी है और यह समझ भी विकसित हुई है कि इस खेल को लोकप्रिय बनाने के लिए किन कदमों की जरूरत है।”
आइस रिंक का निर्माण अत्यंत महंगा होता है। एक साधारण रिंक पर लगभग 15 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है, जबकि करीब 5,000 दर्शकों की क्षमता वाले एक छोटे इनडोर स्टेडियम की लागत 40 से 50 करोड़ रुपये तक हो सकती है।
इतनी बड़ी राशि के लिए कॉरपोरेट सहयोग अनिवार्य है। यदि रिलायंस, अडानी या टाटा जैसे बड़े उद्योग समूह आगे आते हैं, तो भारत में आइस हॉकी का परिदृश्य तेजी से बदल सकता है और यह खेल लेह से बाहर भी फैल सकता है।
खबरों के मुताबिक, लद्दाख स्काउट्स के प्रतिनिधियों ने कॉरपोरेट भागीदारी का विचार भी सामने रखा है। सैनिक जहां सीमाओं की रक्षा करते हैं, वहीं कई बार वे कर्तव्य से बढ़कर जिम्मेदारी भी निभाते हैं।
आइस हॉकी इसका जीवंत उदाहरण है। पिछले वर्ष लद्दाख स्काउट्स द्वारा राष्ट्रीय महिला टीम को अंतिम समय में उपलब्ध कराई गई फंडिंग निर्णायक साबित हुई, जिसके चलते भारतीय महिला टीम ने संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित आईआईएचएफ विमेंस एशिया कप में अपना पहला कांस्य पदक जीता।
ये सभी संकेत स्पष्ट करते हैं कि ‘स्नो लेपर्ड्स’ या ‘स्नो वॉरियर्स’ के नाम से मशहूर लद्दाख स्काउट्स पूरी गंभीरता से इस मिशन में जुटे हैं। उन्हें उम्मीद है कि उनके प्रयास जल्द ही भारत को वैश्विक आइस हॉकी मंच पर एक पहचान दिलाएंगे।
With inputs from IANS