मिनिकॉय के समुद्र में मिले तिरंगे जैसे प्रवाल, जलवायु बदलाव से लड़ने की क्षमता पर मिले अहम संकेतBy Admin Sat, 15 August 2026 04:30 PM

Photo: IANS

लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप के पास समुद्र में नारंगी, सफेद और हरे रंग के प्रवालों का एक साथ पाया जाना वैज्ञानिकों के लिए शोध का नया अवसर लेकर आया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस दुर्लभ खोज से यह समझने में मदद मिल सकती है कि समुद्र का तापमान बढ़ने पर कुछ प्रवाल ज्यादा मजबूती से टिके रहते हैं, जबकि कुछ उसी परिस्थिति में कमजोर पड़ जाते हैं।

यह अनोखा दृश्य भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के शोधार्थी एल्विन एंटो ने समुद्री स्तनधारियों के सर्वेक्षण के दौरान कैमरे में कैद किया। वैज्ञानिकों ने नारंगी रंग के प्रवाल की पहचान Lobophyllia corymbosa के रूप में की है, जबकि सफेद और हरे रंग के प्रवाल Lobophyllia radians प्रजाति के हैं।

इस खोज का सबसे दिलचस्प पहलू एक ही प्रजाति की दो पड़ोसी प्रवाल कॉलोनियों की अलग-अलग स्थिति है। दोनों लगभग एक-दूसरे के बगल में बढ़ रही हैं, लेकिन एक कॉलोनी समुद्र के बढ़े तापमान के कारण ब्लीच हो चुकी है, जबकि दूसरी अब भी स्वस्थ और हरे रंग की बनी हुई है।

वैज्ञानिकों के लिए यह प्राकृतिक तुलना बेहद महत्वपूर्ण है। एक जैसी परिस्थितियों में रहने वाली एक ही प्रजाति की दो कॉलोनियों की अलग-अलग प्रतिक्रिया यह पता लगाने में मदद कर सकती है कि कुछ प्रवाल तापीय तनाव को दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से कैसे सहन कर पाते हैं।

CMFRI के निदेशक डॉ. ग्रिनसन जॉर्ज ने कहा कि यह खोज केवल भारत की समृद्ध समुद्री जैव विविधता का प्रतीक नहीं है, बल्कि जलवायु संबंधी दबावों के बीच प्रवालों की मजबूती और उनकी संवेदनशीलता की कहानी भी बताती है। उनके अनुसार, दोनों पड़ोसी कॉलोनियों के अलग-अलग व्यवहार से तापीय तनाव सहने की क्षमता को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में प्रवाल भित्तियों के संरक्षण और पुनर्स्थापना में किया जा सकता है।

समुद्र का तापमान बढ़ना प्रवालों के लिए बड़ी चुनौती है। अत्यधिक तापीय तनाव की स्थिति में प्रवाल अपने शरीर में रहने वाले सहजीवी शैवाल को बाहर कर देते हैं। यही शैवाल प्रवालों को उनकी ऊर्जा और रंग प्रदान करते हैं। इस प्रक्रिया को कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है। यदि ब्लीचिंग लंबे समय तक बनी रहे तो प्रवाल कमजोर होकर मर भी सकते हैं।

मिनिकॉय में मिली दोनों कॉलोनियां इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे लगभग एक जैसी पर्यावरणीय परिस्थितियों में रहते हुए अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रही हैं। इससे वैज्ञानिकों को प्रयोगशाला के बजाय प्राकृतिक वातावरण में प्रवालों की ताप सहनशीलता का अध्ययन करने का अवसर मिल रहा है।

CMFRI समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से मजबूत बनाने के लिए अन्य स्तरों पर भी काम कर रहा है। केंद्र के सहयोग से संस्थान तटीय क्षेत्रों में कृत्रिम रीफ लगाने की गतिविधियों को बढ़ा रहा है। इनका उद्देश्य खराब हो चुके समुद्री आवासों को पुनर्जीवित करना, जैव विविधता बढ़ाना और छोटे स्तर के मछुआरा समुदायों को सहारा देना है।

इसके अलावा मछलियों के प्रजनन, बीज उत्पादन और समुद्र में मत्स्य संसाधनों के पुनर्स्थापन से जुड़े कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक आवासों की बहाली और कृत्रिम रीफ जैसी पहल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भविष्य के जलवायु दबावों के प्रति अधिक लचीला बनाने में मदद कर सकती हैं।

मिनिकॉय के समुद्र में मिले ये रंग-बिरंगे प्रवाल इसलिए सिर्फ एक खूबसूरत तस्वीर नहीं हैं। इनके बीच दिखाई दे रहा अंतर वैज्ञानिकों को उस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब खोजने में मदद कर सकता है कि गर्म होते समुद्र में कुछ प्रवाल कैसे बच जाते हैं, जबकि दूसरे ब्लीचिंग का शिकार हो जाते हैं। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के दौर में इस सवाल का जवाब दुनिया की प्रवाल भित्तियों को बचाने की कोशिशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
 

With inputs from IANS