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नई दिल्ली। एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा Starlink की भारत में लॉन्चिंग में हो रही देरी के पीछे घरेलू टेलीकॉम कंपनियों का विरोध नहीं, बल्कि लंबित नियामकीय और सुरक्षा संबंधी मंजूरियां प्रमुख वजह हैं। Europinion की एक नई रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में Starlink की सेवाएं शुरू करने की प्रक्रिया कई आवश्यक सरकारी स्वीकृतियों के अभाव में अटकी हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, Starlink को जून 2025 में भारत में परिचालन के लिए लाइसेंस मिल गया था, लेकिन कंपनी अब तक व्यावसायिक सेवाएं शुरू नहीं कर सकी है। इसके लिए उसे सुरक्षा मंजूरी, स्पेक्ट्रम आवंटन और विदेशी निवेश से जुड़े कुछ अनुमोदनों का इंतजार है।
दरअसल, अक्टूबर में एलन मस्क ने आरोप लगाया था कि भारत में प्रभावशाली कारोबारी हित Starlink की एंट्री में बाधा डाल रहे हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें निराधार और गलतफहमी पर आधारित बताया था।
Europinion की रिपोर्ट का मानना है कि इस पूरे विवाद में दोनों पक्ष अपनी-अपनी कहानी का केवल एक हिस्सा सामने रख रहे हैं। रिपोर्ट ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि भारतीय टेलीकॉम क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों रिलायंस जियो और भारती एयरटेल ने वर्ष 2025 में Starlink की सेवाओं को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए उसके साथ समझौते किए थे। इससे यह संकेत मिलता है कि घरेलू कंपनियों का रुख पूरी तरह विरोध वाला नहीं रहा है।
स्पेक्ट्रम आवंटन का मुद्दा भी इस मामले में अहम है। भारतीय टेलीकॉम कंपनियां स्पेक्ट्रम की नीलामी के पक्ष में रही हैं, जबकि केंद्र सरकार ने अंततः प्रशासनिक आवंटन का रास्ता चुना। यह व्यवस्था Starlink की प्राथमिकता के अधिक अनुकूल मानी जाती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेक्ट्रम की कीमत को लेकर सरकारी समिति ने सितंबर में अपनी मंजूरी दे दी थी, लेकिन इस पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है। रिपोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों के दावों में कुछ कमियां हैं और वास्तविक स्थिति इन दोनों के बीच कहीं है।
सुरक्षा मंजूरी का मामला केवल Starlink तक सीमित नहीं है। जियो के सैटेलाइट इंटरनेट कारोबार और Eutelsat OneWeb जैसी कंपनियों को भी सुरक्षा संबंधी स्वीकृतियों की जरूरत है। रिपोर्ट में सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह निराधार नहीं माना गया है। इसके लिए अंडमान द्वीप समूह के पास एक ड्रग जब्ती और 2024 में मणिपुर में हुई सुरक्षा कार्रवाई के दौरान Starlink ब्रांड वाले उपकरण मिलने की घटनाओं का उल्लेख किया गया है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि सुरक्षा जांच में इतना समय क्यों लग रहा है। इस प्रक्रिया को पूरा करने की कोई निश्चित समयसीमा भी नहीं बताई गई है। सरकार की ओर से केवल इतना संकेत दिया गया है कि स्पेक्ट्रम की कीमतों पर फैसला जल्द हो सकता है।
रिपोर्ट ने भारत में डिजिटल कनेक्टिविटी की चुनौती की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। इसके मुताबिक, मई 2026 तक देश के 11 हजार से अधिक गांवों में 4G कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में सैटेलाइट इंटरनेट ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। इसके लिए जरूरी नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल और समयबद्ध बनाना उपयोगी साबित हो सकता है।