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भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था आने वाले वर्षों में तेज रफ्तार से बढ़ सकती है और 2033 तक करीब 4.22 लाख करोड़ रुपये (44 अरब डॉलर) के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, नीतिगत सुधार, निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं की लगातार बढ़ती मांग इस विस्तार के प्रमुख आधार होंगे।
EY और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल सरकारी वैज्ञानिक और अंतरिक्ष अभियानों तक सीमित नहीं रह गया है। Indian Space Policy 2023, Indian National Space Promotion and Authorization Centre (IN-SPACe) के माध्यम से किए गए सुधार और NewSpace India Ltd. (NSIL) की भूमिका ने अंतरिक्ष क्षेत्र को सरकार-केंद्रित मॉडल से उद्योग और निजी क्षेत्र की भागीदारी वाले व्यापक इकोसिस्टम की ओर बढ़ने का आधार तैयार किया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2033 तक अनुमानित वृद्धि हासिल करने के लिए सरकार, उद्योग, स्टार्टअप, निवेशकों, शिक्षण एवं शोध संस्थानों और रणनीतिक उपयोगकर्ताओं को अगले सात से आठ वर्षों तक समन्वित तरीके से काम करना होगा।
अंतरिक्ष क्षेत्र के विकास के लिए छह प्रमुख प्राथमिकताएं
रिपोर्ट में भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को अगले स्तर तक ले जाने के लिए छह प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई गई है।
इनमें विभिन्न क्षेत्रों में अंतरिक्ष आधारित सेवाओं और एप्लिकेशन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल बढ़ाना, घरेलू विनिर्माण और लॉन्च क्षमता को मजबूत करना, नियामकीय व्यवस्था और वित्तपोषण के माहौल को बेहतर बनाना तथा सरकारी मांग का इस्तेमाल व्यावसायिक अंतरिक्ष सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए करना शामिल है।
इसके अलावा रक्षा और रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करना तथा भारत को वैश्विक अंतरिक्ष साझेदार और अंतरिक्ष सेवाओं के निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करना भी महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल है।
सैटेलाइट से लेकर जियोस्पेशियल एनालिटिक्स तक पूरा इकोसिस्टम
रिपोर्ट के मुताबिक भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का दायरा काफी व्यापक है। इसके अपस्ट्रीम हिस्से में सैटेलाइट निर्माण, लॉन्च व्हीकल, प्रोपल्शन सिस्टम और एवियोनिक्स जैसी गतिविधियां आती हैं।
मिडस्ट्रीम में ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और सैटेलाइट संचालन शामिल हैं, जबकि डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में Earth Observation (EO), सैटेलाइट कम्युनिकेशन (SATCOM), नेविगेशन सेवाएं और जियोस्पेशियल एनालिटिक्स जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है।
कृषि से आपदा प्रबंधन तक बढ़ रहा अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल
रिपोर्ट के अनुसार, अंतरिक्ष आधारित डाउनस्ट्रीम सेवाएं अब केवल वैज्ञानिक या संचार जरूरतों तक सीमित नहीं हैं। कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन, बुनियादी ढांचे की योजना, जलवायु परिवर्तन से निपटने और शासन व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सैटेलाइट आधारित सेवाओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
रक्षा क्षेत्र में भी सुरक्षित संचार और समुद्री क्षेत्र की निगरानी जैसी क्षमताओं के लिए अंतरिक्ष तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है।
CII की राष्ट्रीय अंतरिक्ष समिति के चेयरमैन मल्लवरपु अप्पाराव ने कहा कि भारत का अंत