कश्मीर से आगे क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में पाकिस्तान और तुर्किये, अमेरिकी विशेषज्ञ ने उठाए सवालBy IANS Thu, 05 November 2026 07:31 PM

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नई दिल्ली। पाकिस्तान और तुर्किये की भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणियों को लेकर एक नई रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। अमेरिकी विशेषज्ञ माइकल रुबिन ने दोनों देशों की धार्मिक नीतियों और अल्पसंख्यकों के साथ उनके व्यवहार का हवाला देते हुए कहा है कि जिन देशों में धार्मिक भेदभाव और असहिष्णुता के आरोप लगते रहे हैं, उन्हें दूसरे देशों के सामाजिक और धार्मिक मामलों पर टिप्पणी करते समय अपने रिकॉर्ड पर भी ध्यान देना चाहिए।

द संडे गार्जियन में प्रकाशित अपने ताजा लेख में रुबिन ने पाकिस्तान में हिंदुओं और ईसाइयों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव, सांप्रदायिक हिंसा और ईशनिंदा कानूनों के कथित दुरुपयोग का उल्लेख किया। उनका कहना है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति पर गंभीर सवाल मौजूद हैं, ऐसे में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर की जाने वाली उसकी टिप्पणियों की भी इसी संदर्भ में पड़ताल होनी चाहिए।

रुबिन ने तुर्किये के सरकारी मीडिया में भारत के खिलाफ प्रकाशित लेखों और टिप्पणियों को भी अपने विश्लेषण का हिस्सा बनाया। उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन के पसंदीदा अखबार और उनकी सरकार के अनौपचारिक मुखपत्र के रूप में वर्णित येनी शफाक के संपादक इब्राहिम कारागुल के अप्रैल 2025 के लेख का हवाला दिया।

कारागुल ने अपने लेख में लिखा था कि यदि चीन और तुर्किये पाकिस्तान के साथ खड़े होते हैं तो भारत के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। उन्होंने इस संदर्भ में मुगल साम्राज्य, सेल्जुक और उस्मानी साम्राज्य का भी उल्लेख किया था।

रुबिन ने इसी अखबार में 8 मई को प्रकाशित पाकिस्तानी स्तंभकार फरकान हामिद के संपादकीय का भी जिक्र किया। हामिद तुर्की के सरकारी टेलीविजन के उर्दू सेवा विभाग के प्रमुख हैं। उनके लेख में दावा किया गया था कि भारत अल्पसंख्यकों के रहने लायक देश नहीं रह गया है। इसके अगले दिन सबाह अखबार की स्तंभकार हिलाल कापलान ने आरोप लगाया था कि भारत में लंबे समय से मुसलमानों का कथित नरसंहार जारी है।

रुबिन ने अपने लेख में भारत और अन्य देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की तुलना करते हुए फ्रीडम हाउस की वार्षिक रैंकिंग का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में मुसलमानों को कई मुस्लिम बहुल देशों की तुलना में अधिक अधिकार प्राप्त हैं। उनके अनुसार, फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में भी भारत की स्थिति पाकिस्तान और तुर्किये जैसे देशों से अलग दिखाई देती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि फ्रीडम हाउस के विश्लेषकों का भारत के प्रति रुख ऐतिहासिक रूप से आलोचनात्मक रहा है।

वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट फोरम में नीति विश्लेषण निदेशक रुबिन ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के 16 अप्रैल 2025 के बयान का भी उल्लेख किया। मुनीर ने कहा था, "हमारे पूर्वजों का मानना था कि हम जीवन के हर पहलू में हिंदुओं से अलग हैं। हम दो राष्ट्र हैं, एक राष्ट्र नहीं।"

रुबिन के मुताबिक, पाकिस्तान की विदेश नीति और बयानबाजी पहले मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर पर केंद्रित रहती थी, लेकिन तुर्किये के साथ उसके बढ़ते सामरिक और राजनीतिक तालमेल से क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं का दायरा व्यापक होने के संकेत मिलते हैं। उन्होंने तुर्किये की विदेश नीति में बढ़ते इस्लामवादी झुकाव का भी उल्लेख किया और कहा कि दोनों देशों की हालिया गतिविधियों को केवल कश्मीर के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए।

पाकिस्तान और तुर्किये के नेताओं के भारत संबंधी बयानों का जिक्र करते हुए रुबिन ने दोनों देशों की धार्मिक सहिष्णुता से जुड़े रिकॉर्ड पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के गठन के समय वहां हिंदू और ईसाई समुदायों की बड़ी आबादी थी। देश के शुरुआती दौर में इन समुदायों के प्रमुख त्योहारों को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में भी मान्यता देने पर विचार किया गया था।

रुबिन का आरोप है कि समय के साथ हिंसा, कथित राज्य-प्रेरित हमलों और ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग के कारण बड़ी संख्या में हिंदुओं और ईसाइयों को पाकिस्तान छोड़ना पड़ा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पाकिस्तान भारत में खालिस्तान आंदोलन का समर्थन करता है, लेकिन पाकिस्तानी पंजाब में सिख समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक घटनाक्रम और उनके विस्थापन पर समान रूप से चर्चा नहीं करता।

रुबिन के इस विश्लेषण का मुख्य तर्क है कि भारत के धार्मिक और सामाजिक मामलों पर पाकिस्तान तथा तुर्किये की टिप्पणियों का आकलन करते समय उनके अपने घरेलू हालात और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।