महासमाधि: क्रियायोग परंपरा के दिव्य गुरुओं की अमर विरासतBy Admin Thu, 05 March 2026 04:41 PM









रांची: ईश्वरीय प्रकाश से दीप्तिमान गुरु को नश्वरता प्रभावित नहीं कर सकती। मृत्यु के समय पूर्ण चेतन अवस्था में वे अपनी मानवीय देह का त्याग करते हैं, इसी को महासमाधि कहते हैं।
मार्च माह क्रियायोग परम्परा के दो अद्वितीय संतों की महासमाधि की याद दिलाता है — आध्यात्मिक गौरव ग्रंथ “योगी कथामृत” के लेखक श्री श्री परमहंस योगानन्दजी, जिन्होंने 7 मार्च, 1952 को और उनके गुरु और “कैवल्य दर्शनम्” के लेखक श्री श्री स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि, जिन्होंने 9 मार्च, 1936 को महासमाधि में प्रवेश किया। 
दोनों ही गुरुओं ने अपने वर्तमान समय के और भविष्य में आने वाले शिष्यों के हृदयों में सदा के लिए वास करने और उनके लिए अपनी नित्य विद्यमानता को बनाए रखने का वचन दिए बिना शरीर नहीं छोड़ा। योगानन्दजी ने सत्तानबे वर्ष पूर्व अपनी एक कविता में लिखा था, “अज्ञात मैं तुम्हारे साथ चलूँगा और अपने अदृश्य हाथों से तुम्हारी रक्षा करूँगा।”
योगानन्दजी 17 वर्ष की आयु में पहली बार बनारस में श्रीयुक्तेश्वरजी से मिले थे। उस समय उनके मन में अपने गुरु को खोजने की प्रबल इच्छा थी। और बनारस की गलियों में उन्हें प्राप्त कर लेने के बाद, योगानन्दजी अपने गुरु के कठोर अनुशासन में भी उनके साथ बने रहे। युक्तेश्वरजी ने योगानन्दजी को छोटे बालक के रूप में दस वर्षों तक प्रशिक्षित किया ताकि वे आने वाले वर्षों में एक विश्व प्रसिद्ध गुरु बन सकें। उनके महान् गुरु श्रीयुक्तेश्वर गिरिजी ने अतुलनीय महावतार बाबाजी द्वारा दिये गए उत्तरदायित्व — अर्थात् उन युवा साधु को समुद्र पार पश्चिम में क्रियायोग का प्रसार करने के लिए तैयार करना को दिव्य रूप से पूर्ण किया; वही क्रियायोग जिसमें 30 सेकंड की एक प्रभावी क्रिया-श्वास, एक वर्ष के प्राकृतिक मानवीय क्रमविकास के बराबर होती है।
परमहंस योगानन्दजी की महासमाधि क्रियायोग के प्रभाव का सर्वोत्तम प्रमाण थी। मृत्यु के 20 दिन बाद भी उनके शरीर में क्षय के कोई चिन्ह दिखाई नहीं दिए। शवागार के निर्देशक श्री हैरी टी. रोवे ने सूचित किया था कि परमहंस योगानन्दजी की देह “निर्विकारता की एक अद्भुत अवस्था में थी।” महान् गुरु ने न केवल जीवन में अपितु मृत्यु में भी सम्पूर्ण मानवजाति के समक्ष प्रदर्शित कर दिया था कि योग और ध्यान से सृष्टि की शक्तियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
“योगी कथामृत" में बताया गया है कि क्रियायोग का अभ्यास हर श्वास के साथ रक्त को कार्बनरहित करता है, जिसके कारण अंत समय में शरीर में विकार नहीं होता। यह एक पुरातन विज्ञान है जो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था और तत्पश्चात पतंजलि और अन्य लोगों ने इसे जाना। वर्तमान युग में, महावतार बाबाजी ने इसे लाहिड़ी महाशय को दिया, जिन्होंने पुनः इसे योगानन्दजी के गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरिजी को प्रदान किया।
क्रियायोग की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीयुक्तेश्वरजी ने एक संस्था की स्थापना करने पर बल दिया; वास्तव में, इस ज्ञान को साझा करना आवश्यक था। इसलिए योगानन्दजी ने सन् 1917 में राँची में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (वाईएसएस) और सन् 1920 में लॉस एंजेलिस में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप (एसआरएफ़) की स्थापना की। कोई भी व्यक्ति योगदा आश्रमों के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार हेतु गृह अध्ययन पाठमाला, जिसमें ध्यान की वैज्ञानिक प्रविधियों को भली-भाँति सीखने के लिए क्रमानुसार निर्देश प्रस्तुत किए गए हैं, के लिए पंजीकरण कर सकता है। 
परमहंस योगानन्दजी ने कहा था, “मेरे जाने के बाद मेरी शिक्षाएँ ही गुरु होंगीं। शिक्षाओं के माध्यम से आप मुझसे और उन महान् गुरुओं से जिन्होंने मुझे भेजा है, समस्वर रहेंगे।”
लेखिका: नेहा प्रकाश
 

ADVERTISEMENT
Advertisement
ADVERTISEMENT
Advertisement

ADVERTISEMENT
Advertisement

ADVERTISEMENT
Advertisement
ADVERTISEMENT
Advertisement