भारत को अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर सख्त 'फ्रंट-ऑफ-पैक' लेबलिंग की जरूरत: विशेषज्ञBy Admin Wed, 04 June 2025 05:43 AM









नई दिल्ली – सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने मंगलवार को कहा कि भारत को अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPF) जैसे पहले से पैक किए गए खाद्य और पेय उत्पादों पर, जिनमें शुगर, नमक और संतृप्त वसा की मात्रा अधिक होती है, सख्त ‘फ्रंट-ऑफ-पैक’ चेतावनी लेबलिंग की आवश्यकता है।

जबकि उच्च वसा, शुगर और नमक (HFSS) वाले या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड उत्पादों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले खतरे के सबूत लगातार बढ़ रहे हैं, भारत के 29 अग्रणी सार्वजनिक स्वास्थ्य और उपभोक्ता संगठनों के एक समूह ने सरकार से ऐसे उत्पादों पर अनिवार्य चेतावनी लेबल लागू करने की मांग की है।

ICMR-NIN दिशानिर्देश 2024 के अनुसार, HFSS खाद्य पदार्थ वे हैं जो वसा, शुगर या नमक की अनुशंसित सीमाओं से अधिक होते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थ ऊर्जा में अधिक, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों और फाइबर में कम होते हैं और मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोगों (NCDs) के बढ़ते खतरे से जुड़े होते हैं।

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (PHFI) से प्रोफेसर के. श्रीनाथ रेड्डी ने कहा,
“भारत अब और इंतज़ार नहीं कर सकता, जब NCDs तेज़ी से बढ़ रही हैं और बच्चे बाज़ार का निशाना बन रहे हैं। चेतावनी लेबल सरल, प्रभावी और साक्ष्य-आधारित समाधान हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में भ्रामक और अपर्याप्त फूड लेबलिंग पर चिंता व्यक्त की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया 'मन की बात' कार्यक्रम में बच्चों में चीनी की खपत को लेकर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया – वे कितनी शुगर खा रहे हैं और उन्हें आदर्श रूप से कितना खाना चाहिए।

इस साल की शुरुआत में उन्होंने मोटापे की समस्या से निपटने के लिए वसा की खपत कम करने पर भी ज़ोर दिया। उनका मानना था कि इस तरह की जागरूकता बच्चों को बेहतर और स्वस्थ विकल्पों की ओर ले जाएगी।

NAPi (नैशनल थिंक टैंक ऑन न्यूट्रिशन पॉलिसी) के संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता ने कहा,
“यदि चेतावनी लेबल अनिवार्य नहीं होंगे तो जनता अंधेरे में ही रहेगी। उद्योग के हित बच्चों के स्वास्थ्य के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकते।”

उन्होंने आगे कहा, “दुनियाभर में स्वयं-नियमन असफल रहा है। सख्त 'फ्रंट-ऑफ-पैक' लेबलिंग नियमों की जरूरत है और इन्हें सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।” उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए यह बात कही।

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार को तीन महीने में 2022 के मसौदा नियमों में संशोधन करने का निर्देश दिया, यह कहते हुए कि खाद्य पैकेटों में “कोई जानकारी नहीं होती।” कोर्ट ने कुरकुरे और मैगी जैसे उत्पादों को लेकर चिंता व्यक्त की।

 

With inputs from IANS

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