क्यों मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना ज़रूरी हैBy Admin Fri, 03 October 2025 05:54 AM









नई दिल्ली — देश में लगातार बढ़ रहे अवसाद और चिंता जैसे मानसिक रोगों के मामलों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना अब अत्यंत आवश्यक हो गया है। ऐसा करने से भारत न केवल स्वस्थ बल्कि अधिक उत्पादक और मज़बूत समाज का निर्माण कर सकेगा।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2016) के अनुसार, भारत की लगभग 13.2 प्रतिशत आबादी अपने जीवनकाल में किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त होती है, जबकि 10.6 प्रतिशत लोग वर्तमान में इससे प्रभावित हैं। यानी हर दस भारतीयों में से एक अवसाद, चिंता या नशे की लत जैसी स्थितियों से जूझ रहा है। इनमें अवसाद सबसे आम है, विशेषकर महिलाओं में।

सरकारी योजनाएँ जैसे टेली-मानस (Tele-MANAS) कई भाषाओं में त्वरित परामर्श प्रदान कर रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रयास अकेले पर्याप्त नहीं हैं।

“मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य को अलग नहीं किया जा सकता,” डॉ. प्रभा चंद्रा, वरिष्ठ मनोचिकित्सक एवं पूर्व डीन, बिहेवियरल साइंसेज, निमहांस (बेंगलुरु) ने कहा।
“मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों में डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियाँ अधिक पाई जाती हैं, वहीं शारीरिक रोगों से जूझने वाले लोग अवसाद और चिंता के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। खराब मानसिक स्वास्थ्य सीधे-सीधे कार्यक्षमता, शिक्षा और सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है।”

डॉ. चंद्रा का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल अस्पतालों या क्लीनिकों तक सीमित न रखकर स्कूलों, कार्यस्थलों, महिला आश्रयों और पुलिस सेवाओं तक पहुँचाना होगा।

इसी तरह डॉ. शेखर सक्सेना, पूर्व निदेशक, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मानसिक स्वास्थ्य एवं नशा विभाग, ने कहा:

“भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ बहुत अधिक है। आत्महत्या की दरें चिंताजनक हैं और 80–90 प्रतिशत लोगों को आवश्यक उपचार नहीं मिल पाता। महिलाओं, किशोरों और बच्चों में यह समस्या और भी अधिक है।”

वर्तमान में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) के तहत जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) देश के 700 से अधिक ज़िलों में चल रहा है। हर ज़िले में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और नर्सों की टीम है।

“लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। जब 10 प्रतिशत आबादी को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की ज़रूरत है तो एक ज़िले में एक टीम नाकाफी है। प्राथमिक स्वास्थ्य चिकित्सकों को प्रशिक्षित करने से पहचान में मदद मिली है, लेकिन उपचार का अंतर अब भी बहुत बड़ा है — गंभीर रोगों के लिए 70–75 प्रतिशत और आम विकारों के लिए उससे भी अधिक,” डॉ. चंद्रा ने कहा।

शहरी इलाकों में गुमनामी और पहुँच की समस्या है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर हैं। ऐसे में टेली-मानस और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति जैसे प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि अधिक परामर्शदाताओं, मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नर्सों की भर्ती के साथ-साथ टास्क-शेयरिंग मॉडल अपनाने होंगे। इसके अलावा, एक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एलायंस का गठन ज़रूरी है, जो वकालत, दृश्यता और सामूहिक समाधान को बढ़ावा दे सके।

अंततः विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय एजेंडा में सबसे ऊपर लाना होगा।

“केवल तभी भारत एक मज़बूत, स्वस्थ और उत्पादक समाज की ओर बढ़ सकेगा,” डॉ. चंद्रा ने निष्कर्ष में कहा।

 

With inputs from IANS

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