हवाई किरायों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी पर केंद्र की नजर, सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारीBy Admin Mon, 23 February 2026 05:24 PM









नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने सोमवार को भारत का सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि त्योहारों और छुट्टियों के दौरान निजी एयरलाइनों द्वारा वसूले जा रहे अस्थिर हवाई किरायों और अतिरिक्त शुल्कों के मुद्दे की ‘सबसे उच्च स्तर’ पर जांच की जा रही है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में “अस्पष्ट, शोषणकारी और एल्गोरिदम-आधारित” मूल्य निर्धारण प्रणाली तथा यात्रियों के लिए मुफ्त चेक-इन बैगेज सीमा में कटौती को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी।

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने अदालत को बताया कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर सरकार के शीर्ष स्तर पर विचार-विमर्श जारी है। उन्होंने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने भी इस संबंध में बैठक बुलाई है और चार सप्ताह का समय दिए जाने पर सरकार अपना जवाब दाखिल करेगी।

इस पर संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया और मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को तय की।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पीक ट्रैवल अवधि में हवाई किरायों में उतार-चढ़ाव और अतिरिक्त शुल्क लगाना “बेहद गंभीर चिंता” का विषय है। पीठ ने टिप्पणी की, “यह बहुत गंभीर मामला है, अन्यथा हम अनुच्छेद 32 के तहत याचिकाएं स्वीकार नहीं करते।”

अदालत ने फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA) की पक्षकार बनाए जाने की मांग भी खारिज कर दी और कहा कि कोई भी नीतिगत फैसला लेने से पहले केंद्र सरकार सभी हितधारकों से परामर्श करेगी।

गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया था। याचिका में कहा गया था कि आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम के तहत आवश्यक सेवा मानी जाने वाली हवाई यात्रा “अनियंत्रित, अप्रत्याशित और शोषणकारी” किराया व्यवस्था के कारण आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है।

अधिवक्ता चारु माथुर के माध्यम से दायर याचिका में तर्क दिया गया कि आपात स्थितियों, त्योहारों या पीक सीजन में किरायों का अचानक दोगुना-तिगुना हो जाना चिकित्सा, शिक्षा या रोजगार से जुड़े जरूरी सफर करने वाले यात्रियों पर असमान रूप से बोझ डालता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि एयरलाइनों ने बिना ठोस कारण के मुफ्त चेक-इन बैगेज सीमा 25 किलोग्राम से घटाकर 15 किलोग्राम कर दी है, जिससे पहले शामिल सेवा को अतिरिक्त शुल्क के जरिए कमाई का जरिया बना दिया गया है।

इन प्रथाओं को संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताते हुए याचिका में अदालत से आग्रह किया गया कि केंद्र सरकार को किराया नियमन के लिए ढांचा बनाने या अर्ध-न्यायिक अधिकारों से लैस स्वतंत्र विमानन किराया नियामक स्थापित करने का निर्देश दिया जाए, ताकि किराया संरचना की निगरानी, अनुपालन और यात्रियों की शिकायतों का निपटारा किया जा सके।

 

With inputs from IANS

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